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🌟Astro Rajeshwaranand@Rajesh Kumar
M.A. in Astrology, Economics, MERD & LL.B.
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देव उठनी एकादशी
कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव उठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। ज्योतिष के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु चार माह की योगनिद्रा (चातुर्मास) से जागृत होते हैं, जिससे सृष्टि में पुनः शुभ कर्मों की गति प्रारंभ होती है। यह दिन विवाह, मांगलिक कार्यों और धार्मिक अनुष्ठानों के पुनः आरंभ का प्रतीक है। ब्रह्मपुराण के अनुसार जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं तो उनकी चेतना का प्रभाव प्रकृति पर शांत रहता है, और जब वे जागते हैं तो सौर एवं चंद्र ऊर्जा में पुनः संतुलन आता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो यह समय ऋतु परिवर्तन का होता है — वर्षा से शीत ऋतु में संक्रमण का काल — जिसमें वातावरण में सूक्ष्म जीवाणुओं की वृद्धि रुकती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इस दिन उपवास, तुलसी-विवाह और गंगा-स्नान जैसे कर्म शरीर व मन दोनों को शुद्ध करते हैं। अतः देव उठनी एकादशी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ज्योतिषीय व वैज्ञानिक दृष्टि से भी जीवन में नई ऊर्जा, संतुलन और शुभता लाने वाला पर्व है।
3 months ago | [YT] | 0
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🌻 छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं (Wishes)
🌞 "छठ मईया की कृपा से आपके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आरोग्य का प्रकाश फैले। सूर्य देव के आशीर्वाद से आपकी हर मनोकामना पूर्ण हो।
जय छठ मईया! छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं!"
🌼 "डूबते सूर्य को अर्घ्य देने से जीवन की हर कठिनाई डूब जाए और उगते सूर्य के साथ खुशियों की नई किरणें आपके जीवन में आएं। छठ पूजा की मंगलकामनाएं!" 🌞
3 months ago | [YT] | 1
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भाई दूज का महत्व | ज्योतिष, आध्यात्मिक और पौराणिक दृष्टि से भाई दूज क्यों मनाई जाती है
भाई दूज 2025 — यह पावन पर्व दीपावली के दो दिन बाद कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इसे यम द्वितीया भी कहा जाता है।
🌸 पौराणिक कथा:
मान्यता है कि इस दिन भगवान सूर्य की पुत्री यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर आमंत्रित कर तिलक किया और भोजन कराया। यमराज ने प्रसन्न होकर कहा — “जो भी बहन इस दिन अपने भाई को तिलक कर आदरपूर्वक भोजन कराएगी, उसके भाई को दीर्घायु और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होगा।” तभी से यह दिन भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा का प्रतीक बन गया।
🪔 ज्योतिषीय महत्व:
भाई दूज की द्वितीया तिथि चंद्रमा और यम (मृत्यु देव) से जुड़ी मानी जाती है। इस दिन चंद्रमा की शांत ऊर्जा और यम की सुरक्षा शक्ति मिलकर भाई की आयु और रक्षा के योग को सुदृढ़ करती हैं।
यह दिन सूर्य, चंद्र और यम के त्रिगुण संतुलन का भी प्रतीक है — अर्थात् प्रकाश, भावना और जीवन की रक्षा।
🌼 आध्यात्मिक दृष्टि से:
इस दिन बहन अपने भाई के आजीवन कल्याण, लंबी आयु, और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा के लिए प्रार्थना करती है।
भाई दूज केवल रक्षाबंधन की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि यह आत्मिक संबंध और आशीर्वाद का पुनर्संस्कार है।
🌿 वास्तु और परंपरा से जुड़े उपाय:
बहन अपने भाई को तिलक लगाते समय अष्टगंध या चंदन का प्रयोग करे।
तिलक के बाद दूर्वा और फूल अर्पित करें — यह आयु वृद्धि का प्रतीक है।
भाई को चावल या सिक्का दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके देना शुभ रहता है।
भाई इस दिन बहन को वस्त्र या उपहार देकर उसकी रक्षा का संकल्प ले।
🌞 वैज्ञानिक दृष्टि से:
दीपावली के बाद का यह समय सूर्य की उत्तरायण गति से पूर्व का होता है, जब ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया चल रही होती है। भाई दूज के संस्कारात्मक कर्मों से सकारात्मक कंपन और परिवारिक बंधन सशक्त होते हैं।
🕯️ संक्षेप में:
भाई दूज – प्रेम, आशीर्वाद और सुरक्षा का दिव्य संगम।
यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि सच्चा संबंध केवल रक्त का नहीं, आत्मा का होता है।
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गोवर्धन पूजा का महत्व 🌿🙏
गोवर्धन पूजा, जिसे अन्नकूट भी कहा जाता है, दीपावली के अगले दिन (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा) को मनाई जाती है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत की पूजा के स्मरण में मनाया जाता है। इस दिन का धार्मिक, आध्यात्मिक, पर्यावरणीय और सामाजिक — चारों दृष्टियों से अत्यंत गहरा महत्व है।
🌼 पौराणिक महत्व
भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को सिखाया कि हमें प्रकृति और उसके तत्वों का सम्मान करना चाहिए। जब इंद्रदेव ने ब्रजभूमि पर लगातार वर्षा करके क्रोध प्रकट किया, तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर सबकी रक्षा की।
इससे यह संदेश मिला कि —
“प्रकृति ही सच्ची देवी है, और उसका सम्मान करना ही सच्ची पूजा है।”
🪔 आध्यात्मिक महत्व
गोवर्धन पूजा हमें अहंकार त्यागने और श्रद्धा, नम्रता व भक्ति का पाठ सिखाती है।
इंद्र का अहंकार श्रीकृष्ण ने विनम्रता से तोड़ा।
यह सिखाता है कि ईश्वर अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहते हैं।
मनुष्य को कर्म और भक्ति के संतुलन के साथ जीवन जीना चाहिए।
🌾 वैज्ञानिक व पर्यावरणीय दृष्टि से महत्व
गोवर्धन पूजा में गाय, गोबर, मिट्टी और अन्न का विशेष स्थान है।
यह पर्यावरण संरक्षण, जैविक कृषि और पंचतत्वों के सम्मान का प्रतीक है।
गोबर से बने गोवर्धन पर्वत और दीप जलाने से वातावरण में शुद्धता आती है, कीटाणु नष्ट होते हैं।
🍛 अन्नकूट का महत्व
इस दिन घरों और मंदिरों में 56 भोग या अनेक प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं।
इसे अन्नकूट महोत्सव कहते हैं — जो कृषि और अन्न के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है।
यह हमें सिखाता है कि अन्न ही जीवन का आधार है, उसका आदर करना चाहिए।
💫 ज्योतिषीय दृष्टिकोण से
गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तिथि को होती है —
यह तिथि धन, समृद्धि, और शुभारंभ की सूचक है।
इस दिन पूजा करने से गृहस्थ जीवन में सुख, धन और शांति बनी रहती है।
🕉️ संदेश
“गोवर्धन पूजा हमें यह सिखाती है कि प्रकृति, गौ माता और अन्न की रक्षा ही सच्ची भक्ति है।
जब हम प्रकृति का सम्मान करते हैं, तो ईश्वर स्वयं हमारी रक्षा करते हैं।”
astrorajeshwaranand
3 months ago | [YT] | 0
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Astro Rajeshwaranand
💐 *॥* *शुभ दीपावली ॥* 💐
*आपको और आपके परिवार को प्रकाश व प्रसन्नता के पर्व दीपावली पर बहुत बहुत मंगलकामनाएं ! प्रभु श्रीराम की कृपा से इस प्रकाश पर्व पर आप को आठों सिद्धियां, नौवों निधियां, और चारों पुरूषार्थ की प्राप्ति हो ! साथ ही सुख,समृद्धि, आरोग्य, यश, कीर्ति, और खुशी की भी अनवरत प्राप्ति हो ! धन, वैभव, यश, ऐश्वर्य के साथ दीपावली पर माँ महालक्ष्मी आपकी सुख सम्पन्नता, स्वास्थ्य व हर्षोल्लास में वृद्धि करें , इन्हीं शुभकामनाओं के साथ* 🎁🍫
🪄 🪔🕯️ *शुभ दीपावली* 🕯️🪔🪄
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Astro Rajeshwaranand
आप सभी को छोटी दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं
4 months ago | [YT] | 1
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Astro Rajeshwaranand
4 months ago | [YT] | 0
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Astro Rajeshwaranand
करवा चौथ का तर्कसंगत (Logical) और पारंपरिक महत्व – सरल भाषा में
करवा चौथ भारत का एक प्रमुख सुहाग पर्व है, जिसे मुख्यतः विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की स्थिरता के लिए मनाती हैं। यद्यपि इसे धार्मिक आस्था से जोड़ा जाता है, परंतु इसके पीछे गहरा सामाजिक, वैज्ञानिक और भावनात्मक तर्क भी छिपा है।
तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक महत्व
1. परिवारिक एकता और समर्पण का प्रतीक
यह व्रत पति-पत्नी के बीच विश्वास, त्याग और प्रेम का प्रतीक है। उपवास से आत्मनियंत्रण और धैर्य की भावना विकसित होती है, जो वैवाहिक संबंधों को मजबूत बनाती है।
2. स्वास्थ्य और शरीर शुद्धि
एक दिन का निर्जला उपवास शरीर को डिटॉक्स करता है और पाचन तंत्र को विश्राम देता है। इससे मानसिक एकाग्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा में वृद्धि होती है।
3. चंद्रमा से मन का संबंध
वैज्ञानिक दृष्टि से भी चंद्रमा का मानव मन पर असर होता है। चंद्र दर्शन और जल अर्पण मानसिक शांति एवं भावनात्मक संतुलन प्रदान करते हैं।
सामाजिक एवं भावनात्मक महत्व
करवा (मिट्टी का घड़ा) जल का प्रतीक है, जो जीवन ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है।
इस दिन महिलाएँ एक-दूसरे को शुभाशीष देती हैं, जिससे सामाजिक सद्भाव और बहनापा मजबूत होता है।
यह पर्व सिखाता है कि जीवन में धैर्य, विश्वास और त्याग से रिश्ते सुदृढ़ होते है।
अतः करवा चौथ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक भावनात्मक अनुबंध है – प्रेम, विश्वास, त्याग और वैवाहिक सद्भाव का अद्भुत संगम। यह त्योहार हमें सिखाता है कि मजबूत रिश्ते आस्था नहीं, बल्कि समर्पण और एक-दूसरे की खुशियों में जीने से बनते हैं।
Astro Rajeshwaranand #AstroVastuConsultant
4 months ago | [YT] | 1
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Astro Rajeshwaranand
आज शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima) है — जिसे कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा या कुमार पूर्णिमा भी कहा जाता है।
इस दिन का महत्व ज्योतिष, आयुर्वेद, आध्यात्म, और स्वास्थ्य विज्ञान — चारों ही दृष्टियों से अत्यंत विशेष है।
🌕 १. ज्योतिषीय महत्व (Astrological Significance)
तिथि: आश्विन मास की पूर्णिमा
नक्षत्र: भरणी या अश्विनी नक्षत्र (वर्षानुसार परिवर्तन)
चंद्रमा: इस दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं से युक्त होता है और पृथ्वी के सबसे समीप (Perigee) माना जाता है।
प्रभाव:
चंद्रमा मन, भावनाओं, शांति और सौंदर्य का कारक है।
इस दिन उसका प्रकाश अमृततुल्य माना जाता है, जो मन और शरीर दोनों को संतुलित करता है।
ज्योतिष में यह दिन धन, चेतना, और प्रेम से संबंधित चंद्र-ऊर्जा को अधिकतम रूप में प्राप्त करने का अवसर देता है।
🔯 ग्रह योग
इस दिन चंद्रमा और वृषभ राशि (उसकी उच्च राशि) का संबंध विशेष प्रभावशाली होता है।
धन और सुख भाव (२रा और ४था भाव) के ग्रहों की स्थिति का ध्यान रखना शुभ फलदायक होता है।
संपत्ति, मानसिक शांति, और वैवाहिक सुख से जुड़े उपाय आज विशेष फलदायक रहते हैं।
🪔 उपासना और उपाय
रात्रि में चंद्रमा की उपासना कर “ॐ सोमाय नमः” का जप करें।
चांदी के पात्र में खीर बनाकर चांदनी में रखकर अगले दिन प्रसाद रूप में ग्रहण करें — यह चंद्र दोष, मन की अशांति, और नींद की समस्या को दूर करता है।
लक्ष्मी उपासना विशेष फलदायक होती है — आज को-जाग्रति (Ko-Jāgarti) यानी “कौन जाग रहा है?” की रात्रि मानी जाती है — देवी लक्ष्मी जाग्रत भक्तों को दर्शन देती हैं।
🌿 २. आयुर्वेदिक और स्वास्थ्य दृष्टि से महत्व
शरद ऋतु में पित्त दोष प्रबल होता है।
इस दिन रात्रि की ठंडी चांदनी किरणें शरीर की ऊष्मा को संतुलित कर पित्त को शांत करती हैं।
प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार:
> “शरद पूर्णिमायां क्षीरं निशि चंद्रकिरणैः शीतलं कृत्वा पिबेत्।”
अर्थात — शरद पूर्णिमा की रात में चांदनी में रखी खीर का सेवन शरीर के लिए अमृत के समान होता है।
🍶 औषधीय लाभ
1. पित्त शमन: अम्लता, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, और त्वचा के रोगों में लाभ।
2. नेत्र शुद्धि: चांदनी का शीतल प्रकाश आँखों के लिए लाभकारी।
3. मानसिक शांति: मनोवैज्ञानिक तनाव, अनिद्रा, और चिंता में राहत।
4. त्वचा सौंदर्य: त्वचा में चमक और शीतलता बढ़ती है।
5. प्रतिरक्षा शक्ति: चंद्रप्रकाश से प्राण ऊर्जा में वृद्धि होती है।
🧘♂️ ३. आध्यात्मिक व योगिक महत्व
इस रात्रि को पूर्णचंद्र ऊर्जा के कारण कुंडलिनी शक्ति जागरण के लिए अत्यंत उपयुक्त माना गया है।
सहस्रार चक्र और आज्ञा चक्र पर ध्यान करने से मानसिक स्थिरता और दिव्यता का अनुभव होता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने इसी रात्रि को महारास रचा था — जो प्रेम, आनंद और आत्म-एकत्व का प्रतीक है।
🌸 ४. करने योग्य सरल क्रियाएँ
क्रिया लाभ
चांदनी में ध्यान या जप मानसिक शांति व ऊर्जा संतुलन
खीर बनाकर चांदनी में रखना पित्त शमन, चंद्र संतुलन
“ॐ सोमाय नमः” या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप चंद्र व मन के दोषों का शमन
लक्ष्मी पूजन व दीपदान धन और सौभाग्य की वृद्धि
तुलसी के पास दीपक जलाना वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
@astrorajeshwaranand
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🌑 पितृ पक्ष 2025 : ज्योतिष, आध्यात्मिक, खगोल और आयुर्वेदिक दृष्टि से महत्व (उत्तर भारत)
🗓 पितृ पक्ष 2025 की तिथियाँ
प्रारम्भ – 7 सितम्बर 2025 (भाद्रपद पूर्णिमा, चन्द्र ग्रहण के साथ)
समापन – 21 सितम्बर 2025 (अमावस्या, सूर्य ग्रहण के साथ)
👉 तिथिवार पितृ पक्ष (उत्तर भारत पंचांग अनुसार):
1. 7 सितम्बर – पूर्णिमा श्राद्ध (सर्वपितृ पूर्णिमा आरम्भ)
2. 8 सितम्बर – प्रतिपदा श्राद्ध
3. 9 सितम्बर – द्वितीया श्राद्ध
4. 10 सितम्बर – तृतीया श्राद्ध
5. 11 सितम्बर – चतुर्थी श्राद्ध
6. 12 सितम्बर – पंचमी श्राद्ध
7. 13 सितम्बर – षष्ठी श्राद्ध
8. 14 सितम्बर – सप्तमी श्राद्ध
9. 15 सितम्बर – अष्टमी श्राद्ध
10. 16 सितम्बर – नवमी श्राद्ध
11. 17 सितम्बर – दशमी श्राद्ध
12. 18 सितम्बर – एकादशी श्राद्ध
13. 19 सितम्बर – द्वादशी श्राद्ध
14. 20 सितम्बर – त्रयोदशी एवं चतुर्दशी श्राद्ध
15. 21 सितम्बर – सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध (समापन, सूर्य ग्रहण के साथ)
🙏 श्राद्ध कब और क्यों किया जाता है?
श्राद्ध काल: प्रतिदिन जो तिथि होती है, उसी तिथि पर जिन पितरों का निधन हुआ है, उनके लिए श्राद्ध किया जाता है।
श्राद्ध का कारण:
1. पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति हेतु।
2. पितृ ऋण से मुक्ति पाने के लिए।
3. कुल में आयु, स्वास्थ्य, संतान और समृद्धि की वृद्धि हेतु।
सर्वपितृ अमावस्या (21 सितम्बर 2025): इस दिन वे लोग भी श्राद्ध कर सकते हैं जिन्हें अपने पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है। यह दिन सभी पूर्वजों को सामूहिक रूप से तर्पण करने का विशेष अवसर है।
इस वर्ष पितृ पक्ष की शुरुआत और समापन दोनों ही खगोलीय दृष्टि से अत्यंत विशेष हैं। आरम्भ चन्द्र ग्रहण से और समापन सूर्य ग्रहण से होना दुर्लभ योग है। इसे पितरों के प्रति श्रद्धा, कर्म और आत्मशुद्धि का विशेष अवसर माना जा रहा है।
🔭 खगोलीय (Astronomy) दृष्टि से
ग्रहण का अर्थ है पृथ्वी, चन्द्र और सूर्य का विशेष स्थिति में आना।
चन्द्र ग्रहण पितृ पक्ष की शुरुआत में मानसिकता और भावनाओं को गहराई से प्रभावित करता है। यह आत्मनिरीक्षण और पितरों के प्रति भावनात्मक कर्तव्य की याद दिलाता है।
सूर्य ग्रहण समापन में नयी शुरुआत और पुनर्जन्म का प्रतीक है। इसका संदेश है कि पितरों का आशीर्वाद हमें जीवन में नये प्रकाश की ओर ले जाता है।
🔮 ज्योतिषीय (Astrology) दृष्टि से
पितृ पक्ष को ज्योतिष में पितृ ऋण मुक्ति और कुल शुद्धि का काल कहा गया है।
ग्रहण के प्रभाव से पितरों की कृपा या अप्रसन्नता और भी तीव्र रूप से अनुभव की जा सकती है।
यह समय पूर्वजों के दोष (पितृ दोष) शांति, श्राद्ध, तर्पण और दान के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
राहु-केतु के प्रभाव के कारण इस बार पितृ पक्ष में साधना और श्राद्ध का महत्व और भी बढ़ जाता है।
🕉 आध्यात्मिक दृष्टि से
पितृ पक्ष हमें यह स्मरण कराता है कि हमारा अस्तित्व केवल हमारे कर्मों का ही नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों की साधना, तपस्या और संस्कारों का परिणाम है।
पितरों का स्मरण करना, तर्पण, श्राद्ध और दान करना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आध्यात्मिक कृतज्ञता का प्रदर्शन है।
ग्रहण के समय ध्यान, जप और मौन साधना अत्यंत फलदायी मानी गई है।
🌿 आयुर्वेदिक दृष्टि से
आयुर्वेद के अनुसार पितृ पक्ष वर्षा ऋतु और शरद ऋतु के संधिकाल में आता है।
इस समय पाचन शक्ति कमजोर होती है और रोगों की संभावना बढ़ती है।
ग्रहणकाल में शरीर की जैविक लय (Bio-rhythm) प्रभावित होती है, इसलिए उपवास, हल्का भोजन और ध्यान किया जाता है।
श्राद्ध में जो अन्न और जल दान किया जाता है, वह सामाजिक और स्वास्थ्य दृष्टि से भी शुद्धि का कार्य करता है।
✅ पितृ पक्ष में क्या करें (उत्तर भारत के अनुसार)
1. प्रतिदिन पितरों का स्मरण, जल और तिल से तर्पण करें।
2. गौ, ब्राह्मण, गरीब, पक्षी-पशु आदि को अन्न, वस्त्र और दान दें।
3. घर में सत्संग, गीता-पाठ, रामचरितमानस या भागवत का श्रवण करें।
4. ग्रहणकाल में जप, ध्यान और मौन रखें।
❌ पितृ पक्ष में क्या न करें
1. मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज का सेवन न करें।
2. घर में कलह, विवाद या नकारात्मक कार्य न करें।
3. ग्रहणकाल में भोजन पकाना या करना वर्जित है।
4. श्राद्ध दिवस पर झूठ, छल या अपमानजनक कार्य न करें।
🌟 निष्कर्ष
पितृ पक्ष 2025 अद्वितीय है क्योंकि यह दो ग्रहणों के बीच बंधा हुआ है। यह हमें हमारे पितरों के प्रति श्रद्धा, कर्म और आत्मशुद्धि का गहरा अवसर प्रदान करता है। जो व्यक्ति इस काल में श्रद्धा, तर्पण, दान और साधना करता है, उसे पितरों का आशीर्वाद, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति अवश्य प्राप्त होती है।
✍️ Astro RAJESHWARANAND
AstroVastu & Lalkitab Expert
5 months ago | [YT] | 1
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