जनाकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का एक अभिनव व् वैकल्पिक मंच बनाने की एक पहल है भारत जनमत !
यह मंच उन खबरों को प्रसारित करने की कोशिश करता है जिन्हें मुख्य धारा के मीडिया में स्थान नहीं दिया जाता जबकि वे जनसरोकारों से पूर्णतः जुड़ी होती है।आज ज्यों ही हम मीडिया की बात करते है, हमारे जेहन में त्यों ही चौबीस घंटे पोपट की तरह बोलने वाले तमाम समाचार चैनल व अखबार घूम जाते है,जो दिन भर एक्सक्लूसिव के नाम पर अपना राग अलापते रहते हैं । इस भागमभाग की स्थिति ने हमें तमाम समाचारों से वंचित कर दिया है,यही आज मुख्य धारा का मीडिया कहलाता है।जब मुख्य धारा की मीडिया में जन सामान्य की बात को भुलाया जाने लगा और मसालेदार, औचित्यविहीन ख़बरें परोसी जाने लगी और साथ ही साथ जनता की अभिव्यक्ति को जन माध्यम में रोका जाने लगा। अखबारी खबरों पर संदेह किया जाने लगा, तब शनैः शनैः हमने इस मंच को वैकल्पिक मीडिया के रूप में खड़ा करने की मुहीम शुरू कर दी। आज यह मंच मुख्य धारा की मीडिया के बरक्स वैकल्पिक मीडिया के रूप में खड़ा होने की कोशिश कर रहा है।
Bharat Janmat
मानसिक बीमारी को झाड़-फूंक, भूत-प्रेत या देवी-देवता से जोड़ने के पीछे कई सामाजिक और सांस्कृतिक कारण होते हैं:
जानकारी की कमll
बहुत से लोगों को मानसिक बीमारियों के लक्षण और इलाज की जानकारी नहीं होती। इसलिए जब कोई असामान्य व्यवहार करता है, तो लोग उसे दैवी या भूत-प्रेत से जोड़कर समझते हैं।
सांस्कृतिक मान्यताएं:
भारत सहित कई समाजों में पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक और पारंपरिक मान्यताएं इतनी गहरी होती हैं कि किसी भी अनजानी या असामान्य चीज को आध्यात्मिक रूप दे दिया जाता है।
स्वास्थ्य सेवाओं की कमी:
ग्रामीण इलाकों या कम पढ़े-लिखे समाजों में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की पहुंच नहीं होती। वहां झाड़-फूंक करने वाले "बाबा" या "ओझा" ही पहले विकल्प होते हैं।
कलंक (Stigma):
मानसिक बीमारी को अभी भी शर्म की बात समझा जाता है। लोग डॉक्टर के पास जाने के बजाय चुपचाप झाड़-फूंक करवा लेते हैं ताकि समाज को न पता चले।
भावनात्मक सहारा:
जब कोई मानसिक रूप से बीमार होता है तो परिवार के लोग खुद भी डर, दुख और भ्रम में होते हैं। ऐसे में धार्मिक उपाय उन्हें एक भावनात्मक सहारा देते हैं — भले ही इलाज न हो रहा हो।
आपको क्या लगता है मानसिक बीमारी को मानने से समाज क्यों बचता है ?
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10 months ago | [YT] | 1
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14 वर्ष की उम्र से ही देश की आज़ादी के लिए कोड़े खाने वाले चंद्र शेखर आज़ाद बचपन से ही निडर थे। सज़ा देने वाले जज के पूछने पर उन्होंने निर्भीकता से जवाब दिए,और पूरा जीवन स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया.
चंद्रशेखर को ‘आजाद’ नाम एक खास वजह से मिला। चंद्रशेखर जब 15 साल के थे तब उन्हें किसी केस में एक जज के सामने पेश किया गया। वहां पर जब जज ने उनका नाम पूछा तो उन्होंने ने कहा, ‘मेरा नाम आजाद है, मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता और मेरा घर जेल है’। जज ये सुनने के बाद भड़क गए और चंद्रशेखर को 15 कोड़ों की सजा सुनाई, यही से उनका नाम आजाद पड़ गया। चंद्रशेखर पूरी जिंदगी अपने आप को आजाद रखना चाहते थे।
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3 years ago | [YT] | 5
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IIMC यानि Indian Institute of Mass communication में एडमिशन की लास्ट डेट हुई 18 July 2022.
आवेदन करने के लिए NTA की ऑफिशियल वेबसाइट पर जाकर फॉर्म भरा जा सकता है.
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3 years ago | [YT] | 5
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पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के घर व अन्य ठिकानों पर CBI का छापा
3 years ago | [YT] | 3
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Bharat Janmat
क्या आप ईवीएम पर भरोसा करते हैं!!!
6 years ago | [YT] | 4
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