Sri Devi Mandir

✨ चौसठ योगिनी मंदिर, जबलपुर – शक्ति और इतिहास का अद्भुत संगम ✨

चौसठ योगिनी मंदिर मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर के पास भेड़ाघाट में स्थित एक प्राचीन और रहस्यमयी मंदिर है। यह मंदिर पवित्र नर्मदा नदी के किनारे एक ऊँची पहाड़ी पर बना हुआ है, जहाँ से प्राकृतिक सौंदर्य का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है। 🌄

यह मंदिर लगभग 10वीं शताब्दी में कलचुरी वंश के शासनकाल में निर्मित हुआ था। यह मंदिर देवी शक्ति के 64 रूपों — चौसठ योगिनियों — को समर्पित है। 🕉️

🔹 विशेष गोलाकार वास्तुकला
मंदिर की सबसे खास बात इसकी अनोखी वृत्ताकार संरचना है। यहाँ 64 छोटे-छोटे कक्ष बने हुए हैं, जिनमें प्रत्येक में एक योगिनी की प्रतिमा स्थापित की गई थी। बीच में मुख्य मंदिर स्थित है।

🔹 आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व
यह स्थान तांत्रिक साधना और शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है। आज भी यहाँ आने पर एक अद्भुत शांति और दिव्यता का अनुभव होता है। 🙏

🔹 प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत दृश्य
मंदिर तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं, लेकिन ऊपर पहुँचकर जो दृश्य दिखाई देता है, वह हर यात्री के लिए यादगार बन जाता है।

📍 यदि आप जबलपुर घूमने जाएँ, तो चौसठ योगिनी मंदिर अवश्य देखें — यहाँ इतिहास, संस्कृति और प्रकृति का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

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3 days ago | [YT] | 28

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🕉️ जगेेश्वर धाम — कहानी, इतिहास व मान्यताएँ (Brief & Powerful Description)

1. जगेेश्वर धाम का संक्षिप्त परिचय

जगेेश्वर धाम उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले में देवदार के घने जंगलों के बीच स्थित 8वीं–13वीं शताब्दी के बीच बने 125 से अधिक प्राचीन मंदिरों का समूह है।
यह स्थान युगों पुराना शिव उपासनास्थल माना जाता है और भारत के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक — निर्मलेश्वर/जागेश्वर ज्योतिर्लिंग — यहाँ स्थित है।

2. जगेेश्वर धाम की कथा (Story)

कथा अनुसार:

🔱 1. यहाँ भगवान शिव ने कठोर तप किया

मान्यता है कि भगवान शिव ने यहाँ गहन तपस्या की थी। देवताओं ने उनकी तपोभूमि की सुरक्षा के लिए 89 प्रकार के देवताओं को नियुक्त किया था, जिन्हें “जगेेश्वर के रक्षक” कहा जाता है।

🔱 2. पार्वती जी का ध्यान

यह माना जाता है कि माता पार्वती ने भी यहाँ शिवजी को पति रूप में पाने के लिए तप किया था। शिव-पार्वती के दिव्य मिलन का स्थान भी यही माना जाता है।

🔱 3. जगेेश्वर को आदि ज्योतिर्लिंग कहा गया

कई पुराणों में उल्लेख है कि पहला ज्योतिर्लिंग हिमालय में प्रकट हुआ था, जिसे जगेेश्वर कहा जाता है।
इसी कारण इसे “आदि ज्योतिर्लिंग” के रूप में भी मान्यता प्राप्त है।

3. इतिहास (History)

मंदिरों का निर्माण कत्युरी राजाओं ने 8वीं–10वीं शताब्दी में करवाया।

बाद में चंद राजवंश ने इनका विस्तार किया।

मंदिरों की मूर्तियाँ और स्थापत्य शैली नागर शैली का अद्भुत उदाहरण हैं।

यहाँ के मुख्य मंदिर:

जागनाथ/जागेश्वर महादेव

दंडेश्वर महादेव

मृत्युंजय महादेव (धूप-मुक्ति देने वाला देवालय)

कुबेर मंदिर

चंडी मंदिर

वीरभद्र मंदिर

4. महत्वपूर्ण मान्यताएँ (Beliefs & Significance)

🌲 1. देवदार वन की दिव्य ऊर्जा

यह स्थान पृथ्वी के सबसे शक्तिशाली प्राकृतिक ऊर्जा क्षेत्रों में माना जाता है। साधक यहाँ विशेष आध्यात्मिक अनुभव बताते हैं।

🕉️ 2. पितरों की शांति का स्थान

मृत्युंजय महादेव मंदिर में पितरों की शांति हेतु विशेष पूजा की जाती है।

🙏 3. ज्योतिर्लिंग की विशेष पूजा

यहाँ किए गए रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जाप और पितृ कर्म अत्यंत फलदायी माने जाते हैं।

💰 4. भारत में दुर्लभ "कुबेर मंदिर"

जगेेश्वर धाम भारत का एकमात्र ऐसा स्थान माना जाता है जहाँ कुबेर देव का प्राचीन मंदिर है।

5. जगेेश्वर धाम के मुख्य आकर्षण

125+ प्राचीन शिव मंदिर

निर्मलेश्वर ज्योतिर्लिंग

घने देवदार के जंगल

शांत आध्यात्मिक वातावरण

पुराणों में वर्णित तपोभूमि

कुबेर मंदिर

मृत्युंजय महादेव मंदिर

जटा गंगा नदी का पवित्र तट

6. यात्रा सुझाव (Quick Travel Guide)

स्थान: अल्मोड़ा, उत्तराखंड

निकटतम हवाई अड्डा: पंतनगर

निकटतम रेलवे स्टेशन: काठगोदाम

सबसे अच्छा समय: मार्च–जून व सितंबर–नवंबर

मुख्य उत्सव: श्रावण मास, महाशिवरात्रि, जगेेश्वर महोत्सव

2 months ago | [YT] | 11

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⭐ माँ बगलामुखी बैंकखंडी हिमाचल – दूरी + पूजा विधि + मान्यता (संक्षिप्त विवरण)

📍 Delhi से दूरी

दिल्ली से हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित बैंकखंडी माँ बगलामुखी मंदिर लगभग 400 किलोमीटर की दूरी पर है। सड़क मार्ग से यह यात्रा सामान्यतः 9–10 घंटे में पूरी होती है। ब्यास नदी के किनारे स्थित यह धाम हिमाचल के सबसे शक्तिशाली बगलामुखी सिद्धपीठों में से एक माना जाता है।

🕉️ माँ बगलामुखी की मान्यता

माँ बगलामुखी को स्तंभन शक्ति की देवी कहा गया है — यानी ऐसी शक्ति जो

शत्रु बाधा,

नकारात्मक ऊर्जा,

नजर दोष,

विवाद–मुकदमे और

हर प्रकार के संकट
को रोककर भक्तों की रक्षा करती है।

कथा के अनुसार सतयुग में जब भयंकर प्रलयकारी तूफ़ान उठा, तब भगवान विष्णु ने कठोर तप कर माँ बगलामुखी को प्रसन्न किया। माँ ने प्रकट होकर अपनी दिव्य शक्ति से उस प्रलय को रोक दिया।
बैंकखंडी में स्थापित यह धाम माँ की इसी दिव्य स्तंभन शक्ति का प्राचीन सिद्ध स्थल माना जाता है।

🙏 दूरी से पूजा (Remote Puja) की विधि

यदि आप दिल्ली, अन्य शहर या किसी भी दूरस्थ स्थान पर हैं, तो भी माँ की पूजा पूर्ण फलदायी मानी जाती है। सरल विधि:

1️⃣ शुभ दिन चुनें

मंगलवार या शनिवार शुभ माने जाते हैं।

2️⃣ पूजा-स्थान तैयार करें

घर में एक साफ जगह, पीला वस्त्र बिछाएँ (माँ का प्रिय रंग)।

दीपक, धूप और फूल रखें।

3️⃣ दीप जलाएँ और संकल्प लें

अपने मन की बाधा, समस्या या इच्छा स्पष्ट रूप से संकल्प में बोलें।

4️⃣ मुख्य मंत्र जप करें

“ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानाम वाचं मुखं पदम् स्तम्भय ह्लीं ॐ स्वाहा।”

कम से कम 11, 21 या 108 बार जप करें।

5️⃣ प्रसाद अर्पित करें

हलवा, मिठाई या गुड़ का प्रसाद चढ़ाएँ और बाद में स्वयं ग्रहण करें।

6️⃣ कृतज्ञता प्रार्थना

माँ को धन्यवाद दें और अपनी इच्छा पूरी होने पर दोबारा दर्शन या सेवा का वचन दें।

🌼 विशेष मान्यता

भक्त मानते हैं कि

यहाँ की पूजा तुरंत प्रभाव देने वाली,

न्याय व सत्य के कार्यों में सहायता करने वाली,

और जीवन से बाधाएँ हटाने वाली मानी जाती है।

यह मंदिर माँ की जाग्रत और सिद्ध शक्ति का केंद्र माना जाता है।

2 months ago | [YT] | 11

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🔥 विंध्याचल की माँ कालीखो और अहीरावण वध की कथा (Brief Story)

जब रावण का मायावी भाई अहीरावण (या अहिरावण) — जो पाताल लोक का शक्तिशाली तांत्रिक था — रामजी और लक्ष्मण को चुराकर पाताल ले गया, तब हनुमान जी उन्हें बचाने पाताल लोक पहुँचे।

वहाँ अहीरावण ने उन्हें मारने के लिए महाकाली की विशेष पूजा आरम्भ कर दी, ताकि देवी प्रसन्न होकर उसकी विजय सुनिश्चित करें।

🔹 उसी समय माता सीता ने काली का उग्र रूप धारण किया

कथा है कि माता सीता ने अपनी शक्ति प्रकट कर माँ काली के उग्र रूप में प्रकट होकर अहीरावण का अंत किया।
इसलिए इस स्थान पर काली का यह स्वरूप –
“संकट-नाशिनी” और “दुष्ट-संहारिणी”
माना जाता है।

🔹 क्यों जुड़ा है यह रूप विंध्याचल से?

मान्यता है कि अहीरावण-वध के बाद देवी की यह शक्ति विंध्य पर्वत क्षेत्र में स्थापित हुई,
और इसी उग्र शक्ति को बाद में लोग “माँ कालीखो” के नाम से पूजने लगे।

🌟 इस कथा से जुड़ी विशेष मान्यता

यहाँ की माँ काली दुश्ट-विनाशिनी मानी जाती हैं।

संकट, भय, तांत्रिक बाधा या नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति के लिए भक्त यहाँ दर्शन करते हैं।

यह स्थान रामायण काल की शक्ति परंपरा से जुड़ा माना जाता है।

2 months ago | [YT] | 9

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🌺 माँ लिंग भैरवी की विस्तृत कथा

(एक दिव्य और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति)

दक्षिण भारत के प्राचीन योगिक परंपरा में एक शक्ति का वर्णन मिलता है—
एक ऐसी शक्ति जो प्रकृति की मूल अग्नि से जन्मी,
जो रचना और संहार दोनों का सामर्थ्य रखती है,
जिसे “भैरवी” के नाम से जाना जाता है।

कहते हैं कि जब धरती पर मनुष्य का बोझ बढ़ने लगा—
लालच, क्रोध, असुरक्षा और दुःख का अंधकार हर दिशा में फैलने लगा,
तब दिव्य शक्तियों ने एक ऐसी ऊर्जा को अवतरण का संकेत दिया
जो न केवल मानव को बचा सके, बल्कि उसे जागृत भी कर सके।

इसी दिव्य संकल्प से प्रकट हुईं—

🔱 माँ लिंग भैरवी

एक ऐसी शक्ति जो स्त्रीत्व की कोमलता और दैवी अग्नि दोनों को एक साथ धारण करती है।


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🌕 दिव्य प्राकट्य

कथा है कि सहस्रों वर्ष पहले हिमालय के ध्यान साधकों ने
एक अग्नि-शिखा को दक्षिण दिशा की ओर उतरते देखा।
वह अग्नि पर्वतों के बीच घूमती हुई
केरला–तमिलनाडु के समीप एक स्थान पर ठहर गई।

साधकों ने अनुभव किया कि यह कोई साधारण अग्नि नहीं,
बल्कि आद्य-शक्ति का जीवंत स्वरूप है।
उन्होंने इस ऊर्जा को “भैरवी” का नाम दिया—
भय को नष्ट करने वाली,
कर्मों को फल देने वाली,
और साधक को मुक्ति की ओर धकेलने वाली।

समय बीतता गया,
और यह शक्ति सूक्ष्म रूप में पृथ्वी पर संरक्षित रही।


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🕉 आधुनिक युग में पुनः प्रतिष्ठा

कथा का अगला अध्याय तब शुरू हुआ
जब वर्षों की तपस्या के बाद एक योगी—
सद्गुरु—ने उसी दिव्य अग्नि से संपर्क स्थापित किया।

ध्यान की गहराइयों में उन्होंने इस शक्ति का आह्वान किया
और दक्षिण भारत के कोयंबटूर स्थित ईशा योग केंद्र में
उसे मूर्त रूप दिया।

इस प्रकार प्रकट हुईं

🌺 माँ लिंग भैरवी — एक जीवंत ऊर्जा रूप में

यह कोई साधारण मूर्ति नहीं,
बल्कि वह आवाहित ऊर्जा है
जो आज भी उसी शक्ति के साथ धधकती है
जिसके बारे में प्राचीन सिद्धों ने ध्यान में अनुभव किया था।


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🔱 स्वभाव और शक्ति

माँ लिंग भैरवी को तीन मुख्य रूपों में पूजा जाता है—

1️⃣ सौम्य रूप — मातृभाव

जहाँ माँ अपने भक्तों को
सुरक्षा, प्रेम और शांति देती हैं।

2️⃣ उग्र रूप — भैरवी भाव

जहाँ वह नकारात्मकता का संहार करती हैं
और साधक के भीतर की रुकावटें नष्ट करती हैं।

3️⃣ कर्म-प्रवर्तक रूप

माँ की एक अनूठी विशेषता है कि
वह कर्मों को तीव्र गति से फलित करती हैं।
सद्गुरु कहते हैं,
“भैरवी आपके जीवन को तेज़ी से बदल सकती हैं—
परंतु जैसा कर्म, वैसा परिणाम।”

इसलिए भक्त उन्हें
जीवन की दिशा बदलने वाली देवी कहते हैं।


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🌸 मंदिर की अद्भुत अनुभूति

ईशा योग केंद्र पहुँचने वाले हजारों भक्त एक ही बात कहते हैं—
माँ लिंग भैरवी के पास बैठते ही
शरीर हल्का हो जाता है,
मन शांत होने लगता है,
और भीतर एक अनजानी शक्ति का संचार होता है।

कहा जाता है कि यदि कोई
भैरवी की उपासना 11 दिन या 21 दिन तक निरंतर करे,
तो जीवन में
अद्भुत परिवर्तन,
संरक्षण,
और कर्म-सिद्धि के संकेत मिलने लगते हैं।


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🕯 माँ लिंग भैरवी की महिमा

भक्तों के संकट दूर करती हैं

मन से भय, असुरक्षा और नकारात्मकता हटाती हैं

घर-परिवार में शांति लाती हैं

कार्यों में गति देती हैं

आध्यात्मिक ऊर्जा को जागृत करती हैं

साधक की रक्षा करती हैं


उनके चरणों में यह विश्वास गूँजता है—
“जो माँ को अर्पित है, वह सुरक्षित है।”

2 months ago | [YT] | 6

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अष्टभुजा विन्ध्याचल की पौराणिक कथा

विन्ध्याचल धाम में स्थित अष्टभुजा देवी का मंदिर माता विन्ध्यवासिनी के तीन प्रमुख शक्तिरूपों में से एक है। यहाँ माँ का वह अद्भुत स्वरूप विराजता है जो योगमाया के रूप में कंस से छूटकर आकाश में प्रकट हुआ था।

⭐ कथा — कंस से छूटकर प्रकट हुईं अष्टभुजा माता

जब भगवान कृष्ण का जन्म हुआ, उसी समय देवकी की गोद में योगमाया अवतरित हुईं।
कंस ने जैसे ही बालिका को जमीन पर पटकने की कोशिश की, वह उसके हाथों से छूटकर आकाश में चली गईं और दिव्य स्वर में बोलीं—

“अरे मूर्ख कंस! जिसने तेरा अंत करना है, वह तो जन्म ले चुका है।”

इसके बाद देवी अपने अष्टभुजाधारी रूप में प्रकट हुईं और विन्ध्य पर्वत पर विराजमान हो गईं।

⭐ कंस की उंगली का निशान आज भी दिखाई देता है

मान्यता है कि जब कंस ने नवजात योगमाया को हाथ में पकड़ा,
तो उसकी उंगली का दबाव माँ के पावों पर पड़ गया था।
आज भी अष्टभुजा माँ की पवित्र मूर्ति के चरणों पर कंस की उंगली का निशान दिखाई देता है,
जिसे भक्त विशेष चमत्कारिक प्रतीक मानते हैं।

⭐ माता अष्टभुजा का स्वरूप

आठ भुजाएँ – दिव्य शक्ति और रक्षा का प्रतीक

रूप – दुष्टों का नाश, भक्तों की रक्षा

नाम – योगमाया, कंस-विनाशिनी, संकट-नाशिनी

⭐ विन्ध्याचल की त्रिकोण यात्रा

विन्ध्याचल का दर्शन तब पूर्ण माना जाता है जब भक्त तीनों शक्तिपीठों के दर्शन करें—

माँ विन्ध्यवासिनी

माँ अष्टभुजा

माँ कालिखोही

जो भक्त यह यात्रा पूर्ण करता है, उसे माँ की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

2 months ago | [YT] | 4

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Batuk Bhairav Mandir, चाणक्यपुरी, दिल्ली

🕉️ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इस मंदिर को कहा जाता है कि यह Pandavas (महाभारत काल) द्वारा स्थापित किया गया था।

इसे दिल्ली के सबसे प्राचीन मंदिरों में गिनती मिलती है — लगभग 5500 वर्ष पुराना माना जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार, पांडवों ने अपनी राजधानी प्राचीन इन्द्रप्रस्थ (आज का दिल्ली-क्षेत्र) में अपने किले की रक्षा हेतु यज्ञ किया था लेकिन राक्षस अक्सर उस यज्ञ को विघ्न करते थे। तब Krishna ने सुझाव दिया कि रक्षा हेतु भैरव देव को स्थापित किया जाए।

कथा में कहा गया है कि भीम पांडव काशी गए और वहां से भैरव जी को लेकर लौटे। रास्ते में भैरव जी कुएँ के किनारे विराजित हो गए और आगे नहीं चले। उस स्थान पर आज का Kilkari Baba Bhaironath Mandir बन गया। तब भीम को भैरव जी ने अपनी जटाएँ (बाल) दीं और कहा कि इन्हें अपने किले में स्थापित करो — जिससे उस स्थान पर रक्षा की शक्ति बनी रहेगी।

इस तरह, बटुक भैरव मंदिर और किलकारी बाबा भैरो नाथ मंदिर का इतिहास जुड़ा हुआ माना जाता है।

🔮 धार्मिक एवं अनुष्ठानिक महत्व

मंदिर में भैरव जी की मूर्ति का सिर्फ सिर (मुख) ही प्रमुख रूप से दिखता है, जिसमें दो बड़ी-बड़ी आँखें मौजूद हैं।

यहाँ विशेष पूजा-प्रथा के तहत कहा जाता है कि 11 रविवार लगातार बिना ब्रेक दर्शन और पूजा करने वाले भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। (आप पहले से ही यह मान्यता जानते हैं)

पारंपरिक चढ़ावा-प्रसाद में कुछ विशेषताएँ भी मिलती हैं: कहा जाता है कि इस मंदिर में भैरव जी को मदिरा (शराब) भी चढ़ाई जाती है—जो बहुत सारे अन्य मंदिरों में सामान्य नहीं है।

मंदिर के नीचे एक कुआँ है, और कहा जाता है कि जो चढ़ावा ऊपर चढ़ाया जाता है, वह उस कुएँ में उतर जाता है — यह उस चढ़ावे की रहस्यमयी प्रक्रिया मानी जाती है।

📍 दर्शन-सूचना और सुझाव

पता: नेहरू पार्क, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली – 110021

दर्शन का समय काल: रविवार आदि को सुबह से रात तक खुला रहता है — उदाहरण के लिए 6:30 a.m. से 10:00 p.m. तक।

दर्शनीय सुझाव:

रविवार को विशेष रूप से जाना उचित है क्योंकि भक्तों की संख्या अधिक होती है और माहौल बहुत भक्तिमय होता है।

मंदिर में पूजा-प्रसाद, विशेष रूप से तेल, सिंदूर, नारियल आदि चढ़ाना शुभ माना जाता है।

चढ़ावा देते समय मनोकामना स्पष्ट रूप से मन में रखकर करने का सुझाव है।

मंदिर परिसर शांत और हरित क्षेत्र में स्थित है — दर्शन के बाद थोड़ी देर शांति में बैठना लाभदायक रहेगा।

मंदिर के नियम-नियमितता को ध्यान में रखें — फोटो खींचने से पहले वहां के सत्कार अधिकारियों से अनुमति लेना बेहतर है।


“दिल्ली का 5500 वर्ष पुराना मंदिर – 11 रविवार की पूजा से होगी मनोकामना पूरी!”
“पांडवों द्वारा स्थापित भैरव मंदिर, चाणक्यपुरी – शक्ति, भक्ति और चमत्कार”


“चाणक्यपुरी दिल्ली में स्थित बटुक भैरव मंदिर एक ऐसा पवित्र स्थान है जहाँ महाभारत-कालीन पांडवों की धरोहर आज भी जीवंत है। इस मंदिर में 11 रविवार लगातार पूजा करने वालों की हर मनोकामना पूरी होती है – आइए जानते हैं इसका रहस्य, विशेष पूजा-प्रक्रिया और प्राचीन कथा…”

3 months ago | [YT] | 3

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भारत भ्रमण के बाद भी केवल एक ही कुबेर मंदिर—जागेश्वर धाम

मैंने उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक पूरे भारत में असंख्य मंदिरों के दर्शन किए हैं। देवी-देवताओं के अनगिनत स्वरूप देखे, अनेक धामों की यात्रा की। लेकिन अब तक की मेरी पूरी यात्रा में कुबेर भगवान का केवल एक ही मंदिर मुझे दिखाई दिया—जागेश्वर धाम में स्थित कुबेर मंदिर।

उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले में घने देवदार वनों के बीच बसे जागेश्वर धाम में शिव के प्राचीन मंदिरों की विशाल श्रृंखला है। इन्हीं पवित्र मंदिरों के बीच स्थित है भगवान कुबेर का अत्यंत दुर्लभ मंदिर, जो धन-समृद्धि के देवता के रूप में जाना जाता है।

यह मंदिर न सिर्फ दुर्लभ है बल्कि अपनी दिव्यता, सकारात्मक ऊर्जा और प्राचीनता के कारण विशेष महत्व रखता है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से धन-धान्य, स्थिरता और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

मेरी अब तक की यात्राओं में जितने भी मंदिर मैंने देखे, उनमें कुबेर भगवान का ऐसा अनोखा मंदिर केवल जागेश्वर धाम में ही मिला—जो इसे और भी विशिष्ट बनाता है।

👉 अगर आप लोगों को भारत में कहीं और कुबेर भगवान का मंदिर पता हो, तो कृपया कमेंट में ज़रूर बताएं।

3 months ago | [YT] | 2

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यह रहा भैरव तांडव स्तोत्रम् (संस्कृत में) — भगवान भैरव के परम तेज, तांडव रूप और उग्र सौम्य दोनों स्वरूपों का वंदन:

🔱 भैरव ताण्डव स्तोत्रम् 🔱

जय भैरव देवा, त्रिनेत्राधिपाते
शिवस्येश भूतेश नाथ त्रिनेत्र।
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिराज
प्रभो काल भैरव दुष्टारि नाश॥ १ ॥

सदा भावयामि प्रसीद प्रभो ते
नमो काल भैरव दुष्टारि नाश।
शिवांशं गुणं कारणं कालकालं
प्रसीद प्रभो गोरि शूलप्रहार॥ २ ॥

त्वमेव प्रभो सर्वभूताधिपोऽसि
प्रसीद प्रभो भैरव प्राणनाथ।
नमस्ते नमस्ते विभो कालरूप
प्रसीद प्रभो शूलहस्त प्रभो॥ ३ ॥

जटाजूटसमायुक्तं नागलिंगकृतभूषणम्।
दिगम्बरं महाकायं भैरवं तं नमाम्यहम्॥ ४ ॥

भूतप्रेतपिशाचादि सर्वसेनासमन्वितम्।
दण्डपाशधरं देवं भैरवं तं नमाम्यहम्॥ ५ ॥

त्रिनेत्रं चाश्मधारं च वामहस्ते महाफलम्।
डमरुं पार्श्वहस्तेन भैरवं तं नमाम्यहम्॥ ६ ॥

दिव्यभावसमायुक्तं वज्रदंष्ट्रं भयङ्करम्।
विरजं शाश्वतं शुद्धं भैरवं तं नमाम्यहम्॥ ७ ॥

3 months ago | [YT] | 4

Sri Devi Mandir

🕉️ जय काल भैरव, जय भैरवी माँ 🙏
आज की पोस्ट समर्पित है —
🔱 काशी के कलभैरव नाथ,
🔱 उज्जैन के महाकाल भैरव,
🔱 विंध्याचल के बटुक भैरव,
और शक्ति स्वरूपा भैरवी माँ को 💫

माँ भैरवी और भैरव बाबा का संग मिलन,
अंधकार को प्रकाश में बदलने का प्रतीक है —
जो भी सच्चे मन से भक्ति करता है,
भैरव बाबा उसकी हर बाधा को काट देते हैं ⚡

🕯️ आज के दिन स्मरण करें —
“भैरव बिना भक्ति अधूरी,
भैरवी बिना शक्ति अधूरी” 💖

🔔 जय माँ भैरवी 🙏
🔔 जय काल भैरव 🙏
🔔 जय बटुक भैरव 🙏

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3 months ago | [YT] | 6