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होलाष्टक फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से शुरू होने वाले 8 दिनों की अवधि को कहते हैं, जो Holi से पहले आती है।
🔸 यह अवधि होलिका दहन से 8 दिन पहले शुरू होती है।
🔸 इन 8 दिनों में शादी, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य शुभ नहीं माने जाते।
🔸 मान्यता है कि इन दिनों ग्रहों का प्रभाव थोड़ा उग्र रहता है, इसलिए शुभ कार्य टाल दिए जाते हैं।
📿 धार्मिक मान्यता के अनुसार इन दिनों पूजा-पाठ, मंत्र जाप और भक्ति करना शुभ माना जाता है!

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सोमवती अमावस्या 2026: 60,000 वर्षों तक अटल रहेगा पाप-पुण्य

(16-17 फरवरी को बन रहे दुर्लभ योग, जानें पूरी जानकारी और उपाय)

परिचय

फाल्गुन मास की सोमवती अमावस्या 16 और 17 फरवरी 2026 को मनाई जाएगी। यह सिर्फ एक साधारण अमावस्या नहीं है, बल्कि इसमें कई दुर्लभ योग एक साथ बन रहे हैं, जो इसे अत्यंत विशेष और फलदायी बना देते हैं। इस दिन किए गए पाप या पुण्य का फल 60,000 वर्षों तक अटल और अक्षय रहता है।

तिथि और समय का विवरण

तिथि/योग प्रारंभ समाप्त
अमावस्या तिथि 16 फरवरी शाम 5:34 बजे 17 फरवरी शाम 5:30 बजे
सोमवती योग 16 फरवरी शाम 5:34 बजे 17 फरवरी सूर्योदय (~12 घंटे)
पंचक प्रारंभ 17 फरवरी सुबह 9:05 बजे 21 फरवरी रात 7:07 बजे तक

इस अमावस्या पर सूर्य ग्रहण भी है, हालाँकि यह भारत में दिखाई नहीं देगा, लेकिन इसका प्रभाव अवश्य रहेगा। साथ ही, 17 फरवरी को मन्वादि तिथि भी है।

सोमवती अमावस्या की महिमा

सोमवती अमावस्या का महत्व सूर्य ग्रहण की तिथि के समान बताया गया है। इस दिन किए गए स्नान, दान, जप और श्राद्ध का फल अक्षय होता है।

1. 60,000 वर्षों का प्रभाव: इस दिन किया गया कोई भी कार्य (पाप या पुण्य) अगले 60,000 वर्षों तक प्रत्येक जन्म में अटल और अक्षय रहता है। इसलिए इस दिन सत्कर्म करना अत्यंत लाभकारी और पाप से बचना अत्यंत आवश्यक है।
2. विषु संक्रांति के समान फल: इस दिन का महत्व विषु संक्रांति के समान बताया गया है। इस दिन किए गए सभी सत्कर्म अक्षय फल देने वाले होते हैं।

16 फरवरी (सोमवार) को करने योग्य उपाय

16 फरवरी की शाम से ही अमावस्या का प्रभाव प्रारंभ हो जाएगा। इस दिन निम्नलिखित कार्य करने चाहिए:

1. दान-पुण्य: शाम के समय से ही दान-पुण्य, भजन-कीर्तन और जप-तप का कार्य प्रारंभ कर दें। ध्यान रखें, इस दिन शाम के बाद तर्पण नहीं करना चाहिए।
2. तुलसी जी की परिक्रमा: यह एक अत्यंत सरल लेकिन चमत्कारिक उपाय है। इस दिन तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाकर, उसकी 108 बार परिक्रमा करें। परिक्रमा करते समय "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें। इस उपाय से दरिद्रता (गरीबी) का नाश होता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।

17 फरवरी (मंगलवार) को करने योग्य उपाय

यह मुख्य अमावस्या का दिन है और इसमें मन्वादि तिथि का विशेष योग है।

1. स्नान और संकल्प: प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और पितरों के तर्पण-श्राद्ध का संकल्प लें।
2. तर्पण का समय (कुतुप काल): तर्पण के लिए सबसे उत्तम समय कुतुप काल है, जो दोपहर 11:40 बजे से 12:20 बजे तक रहेगा। इस समय निराहार (भोजन न किए हुए) रहकर तर्पण करना चाहिए।
3. मन्वादि में तर्पण का फल: मन्वादि तिथि में किए गए तर्पण से पितर 2000 वर्षों तक तृप्त रहते हैं। यदि संभव न हो तो पिंडरहित श्राद्ध भी किया जा सकता है।

सरल तर्पण विधि

यदि आप विधि-विधान से तर्पण नहीं कर सकते, तो यह सरल विधि अपना सकते हैं:

1. सामग्री: एक तांबे के लोटे में जल भरें। उसमें काले तिल और कुशा डालें।
2. पाठ: इस दिन श्रीमद्भगवद्गीता के 7वें अध्याय का पाठ करें या किसी से सुनें। गीता का पाठ करने का संकल्प ले सकते हैं।
3. दिशा और जल: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। कुशा को मोड़कर अंगूठी की तरह हाथ में पहन लें।
4. अर्पण: अब यह मंत्र बोलते हुए जल अर्पित करें: "गीता के पाठ के पुण्य से मेरे पितर तृप्त हों।"

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हवन और अन्य उपाय

1. अमावस्या हवन: अमावस्या के दिन हवन करना अत्यंत शुभ माना गया है। इससे कुल देवता, ग्राम देवता, स्थान देवता और पितृ देवता सभी तृप्त होते हैं और अपनी विशेष कृपा बरसाते हैं।
2. पंचक में सावधानी: 17 फरवरी सुबह 9:05 बजे से पंचक प्रारंभ हो रहा है। पंचक के दौरान दक्षिण दिशा की यात्रा करने से बचना चाहिए। यदि बहुत आवश्यक हो, तो यात्रा से पहले हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य कर लें।

संक्षिप्त फल तालिका

विशेषता फल
सोमवती अमावस्या पर कर्म 60,000 वर्षों तक पाप या पुण्य अटल
मन्वादि तिथि पर तर्पण पितरों की 2000 वर्षों तक तृप्ति
विषु संक्रांति के समान सभी सत्कर्म अक्षय फलदायी
तुलसी की 108 परिक्रमा दरिद्रता का नाश
अमावस्या हवन कुल-ग्राम-स्थान-पितृ देवता प्रसन्न

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. दिनांक 15.02.2026 रविवार को आने वाला महापर्व👇

“महाशिवरात्रि”

देवों के देव भगवान भोले नाथ के भक्तों के लिये श्री महाशिवरात्रि का व्रत विशेष महत्व रखता हैं। यह पर्व फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनाया जाता है। इस दिन का व्रत रखने से भगवान भोले नाथ शीघ्र प्रसन्न हो, उपवासक की मनोकामना पूरी करते हैं। इस व्रत को सभी स्त्री-पुरुष, बच्चे, युवा, वृद्धों के द्वारा किया जा सकता हैं। इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखने पर तथा शिवपूजन, शिव कथा, शिव स्तोत्रों का पाठ व ‘ॐ नम: शिवाय’ का पाठ करते हुए रात्रि जागरण करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त होता हैं। व्रत के दूसरे दिन यथाशक्ति वस्त्र-क्षीर सहित भोजन, दक्षिणादि प्रदान करके सन्तुष्ट किया जाता हैं।

शिवरात्री व्रत की महिमा

इस व्रत के विषय में यह मान्यता है कि इस व्रत को जो जन करता है, उसे सभी भोगों की प्राप्ति के बाद, मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत सभी पापों का क्षय करने वाला है, व इस व्रत को लगातार 14 वर्षो तक करने के बाद विधि-विधान के अनुसार इसका उद्धापन कर देना चाहिए।

महाशिवरात्री व्रत का संकल्प

व्रत का संकल्प सम्वत, नाम, मास, पक्ष, तिथि-नक्षत्र, अपने नाम व गोत्रादि का उच्चारण करते हुए करना चाहिए। महाशिवरात्री के व्रत का संकल्प करने के लिये हाथ में जल, चावल, पुष्प आदि सामग्री लेकर शिवलिंग पर छोड़ दी जाती है।

महाशिवरात्री व्रत की सामग्री

उपवास की पूजन सामग्री में जिन वस्तुओं को प्रयोग किया जाता हैं, उसमें पंचामृ्त (गंगाजल, दुध, दही, घी, शहद), सुगंधित फूल, शुद्ध वस्त्र, बिल्व पत्र, धूप, दीप, नैवेध, चंदन का लेप, ऋतुफल आदि।

महाशिवरात्री व्रत की विधि

महाशिवरात्री व्रत को रखने वालों को उपवास के पूरे दिन, भगवान भोले नाथ का ध्यान करना चाहिए। प्रात: स्नान करने के बाद भस्म का तिलक कर रुद्राक्ष की माला धारण की जाती है। इसके ईशान कोण दिशा की ओर मुख कर शिव का पूजन धूप, पुष्पादि व अन्य पूजन सामग्री से पूजन करना चाहिए। इस व्रत में चारों पहर में पूजन किया जाता है। प्रत्येक पहर की पूजा में ‘ॐ नम: शिवाय’ व ‘शिवाय नम:’ का जाप करते रहना चाहिए। अगर शिव मन्दिर में यह जाप करना सम्भव न हो, तो घर की पूर्व दिशा में, किसी शान्त स्थान पर जाकर इस मंत्र का जाप किया जा सकता हैं। चारों पहर में किये जाने वाले इन मंत्र जापों से विशेष पूण्य प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त उपावस की अवधि में रुद्राभिषेक करने से भगवान शंकर अत्यन्त प्रसन्न होते है।

शिव अभिषेक विधि

महाशिव रात्रि के दिन शिव अभिषेक करने के लिये सबसे पहले एक मिट्टी का बर्तन लेकर उसमें पानी भरकर, पानी में बेलपत्र, आक धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर शिवलिंग को अर्पित किये जाते है। व्रत के दिन शिवपुराण का पाठ सुनना चाहिए और मन में असात्विक विचारों को आने से रोकना चाहिए। शिवरात्रि के अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।

पूजन करने का विधि-विधान

महाशिवरात्री के दिन शिवभक्त का जमावडा शिव मंदिरों में विशेष रुप से देखने को मिलता है। भगवान भोले नाथ अत्यधिक प्रसन्न होते है, जब उनका पूजन बेल- पत्र आदि चढाते हुए किया जाता है। व्रत करने और पूजन के साथ जब रात्रि जागरण भी किया जाये, तो यह व्रत और अधिक शुभ फल देता है। इस दिन भगवान शिव की शादी हुई थी, इसलिये रात्रि में शिव की बारात निकाली जाती है। सभी वर्गों के लोग इस व्रत को कर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।

॥ॐ नमः शिवाय्॥

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🌹🌹🌹🎊13 तारीख को फागुन महीने की शुभ संक्रांति है। 🙏🏻👯‍♀️🌹🎊 संक्रांति के मोके पर श्री गुरुमहाराज जी के शुभ दर्शन श्री आनंदपुर धाम में 🙏🏻दिन में 11-30 बजे खुलेंगे ।🙏🏻🥁🥁🎺👯‍♀️🌹इसी खुशी में आप सबको 🙏🏻 फागुन की संक्रांति की लाखो लाख बधाई हो ।🖐️🖐️ स्वामी जी की तरफ से आप सबको शुभ आशीर्वाद हो।🖐️🙏🏻🌹👯‍♀️🥁🎺

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होली 2026

होलिका दहन पर एक नहीं दो-दो 'ग्रहण' कब कैसे जलेगी होलिका..?

इस होली रंग गुलाल खेलना है या नहीं

होलिका दहन के दिन चंद्र ग्रहण: साल 2026 का पहला चंद्र ग्रहण 3 मार्च को होलिका दहन के दिन ही लग रहा है, यह चंद्र ग्रहण भारत में भी दिखाई देगा, जिससे इसका सूतक काल माना जाएगा, साथ ही 9 घंटे पहले सुबह से ही चंद्र ग्रहण का सूतक लग जाएगा, ग्रहण काल और ग्रहण के सूतक के दौरान कोई भी शुभकार्य, पूजा-पाठ आदि नहीं किया जाता है, ऐसे में चंद्र ग्रहण के दिन होलिका दहन करने के समय को लेकर उलझन है।

भद्रा काल का भी साया इतना ही नहीं होलिका दहन के दिन भद्रा काल का भी साया है, होलिका दहन पर भद्रा काल 3 मार्च की मध्यरात्रि 01:25 बजे से तड़के सुबह 04:30 बजे तक करीब 3 घंटे रहेगा। इसके अलावा भारतीय समय अनुसार चंद्र ग्रहण 3 मार्च की दोपहर 3 बजकर 20 मिनट से शाम को 6 बजकर 47 मिनट तक रहेगा, वहीं इसका सूतक काल सुबह 6 बजे से ही लग जाएगा, वहीं इससे पहले भद्राकाल रहेगा।

फिर कैसे सुलझेगा मामला? पंचांग के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च 2026 को शाम 5 बजकर 55 मिनट से प्रारंभ होकर 3 मार्च को शाम 5 बजकर 7 मिनट पर समाप्त होगी, ऐसे में होलिका दहन 3 मार्च को किया जाएगा, लेकिन 3 मार्च की तड़के सुबह भद्रा काल और उसके बाद चंद्र ग्रहण का सूतक रहेगा, जब तक चंद्र ग्रहण समाप्त होगा, तब तक पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी। ऐसे में 2 ही रास्ते बचते हैं कि या तो 2 मार्च की रात को ही होलिका दहन कर लिया जाए, वरना 3 मार्च की शाम को होलिका दहन किया जाए, 3 मार्च को होलिका दहन के लिए शुभ मुहूर्त 3 मार्च को शाम 06 बजाकर 22 मिनट से रात 08 बजकर 50 मिनट तक रहेगा, वहीं 2 मार्च को होलिका दहन के मुहूर्त के लिए ज्योतिषाचार्यों में मंथन जारी है।

जय श्री विष्णु

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शनि प्रदोष व्रत भगवान शिव की आराधना का एक विशेष अवसर है, जो भक्तों के जीवन से समस्त संकटों और बाधाओं को दूर करने का सामर्थ्य रखता है।

इस व्रत का पालन करने से न केवल भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, बल्कि उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का भी आगमन होता है।

इस पवित्र दिन पर भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, जिसमें शिवलिंग का जलाभिषेक, धूप-दीप, और मंत्रोच्चारण शामिल होते हैं। भक्तजन इस दिन व्रत रखकर भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

मान्यताओं के अनुसार, शनि प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव की उपासना करने से शनि प्रकोप से भी मुक्ति मिलती है और व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

निशिता मुहूर्त 15 फरवरी की रात्रि में अवश्य रहेगा, लेकिन प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा 14 फरवरी की संध्या में ही की जाएगी।

14 फरवरी 2026 को शाम 06:10 बजे से रात 08:44 बजे तक का समय विशेष रूप से प्रदोष पूजन के लिए अनुकूल रहेगा।

4 days ago | [YT] | 2

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फरवरी महीने में सूर्य देव मकर राशि को छोड़कर कुंभ राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे कुंभ संक्रांति कहा जाता है।

इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से पापों से मुक्ति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस दिन सूर्य देव की पूजा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और स्वास्थ्य लाभ भी मिलता है।

सूर्य देव 13 फरवरी को सुबह 04:14 बजे कुंभ राशि में गोचर करेंगे, इस अवसर पर पूजा, जप-तप और दान-पुण्य का विशेष महत्व है।

5 days ago | [YT] | 10

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विजया एकादशी व्रत फाल्गुन कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है।

पौराणिक शास्त्रों में फाल्गुन कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को समस्त पापों का हरण करने वाली तिथि भी कहते हैं।

यह अपने नाम के अनुरूप फल देती है, इस दिन व्रत धारण करने से व्यक्ति को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है व जीवन के हर क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान राम लंका विजय के लिए समुद्र तट पर पहुंचे थे, तब बगदालभ मुनि ने उन्हें विजया एकादशी का व्रत करने की सलाह दी थी। तब, भगवान राम ने यह व्रत किया, जिसके प्रभाव से उन्हें समुद्र पार करने और रावण पर विजय प्राप्त करने में सफलता मिली।

एकादशी तिथि का प्रारंभ 12 फरवरी 2026 को दोपहर 12 बजकर 22 मिनट पर होगा और इसका समापन 13 फरवरी 2026 को दोपहर 2 बजकर 25 मिनट पर होगा।

व्रत का पारण 14 फरवरी 2026 को सुबह 7 बजे से 9 बजे के बीच किया जाएगा।

6 days ago | [YT] | 7