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सुबह ओपीडी में एक सज्जन आए। बोले वैद्य जी, पहले जैसा ही खा रहा हूँ, पर पेट निकल आया है। कम करूँ तो कमजोरी लगती है, और छोड़ दूँ तो वजन बढ़ता है।
यह स्थिति आज बहुत सामान्य हो गई है।
मोटापा केवल अधिक खाने का परिणाम नहीं। आयुर्वेद की दृष्टि से यह मुख्यतः कफ प्रधान स्थौल्य है, पर अधिकांश मामलों में यह आम-कफज अवस्था बन जाता है। जठराग्नि मंद पड़ती है। भोजन पूरा नहीं पचता। अधपचा अंश आम बनता है। यही आम कफ के साथ मिलकर मेदवह स्रोतों में रुकावट करता है।
धीरे धीरे स्रोतोरोध बढ़ता है। धात्वग्नि भी प्रभावित होती है। रस का पोषण ठीक नहीं होता, पर मेद धातु बढ़ती जाती है। शरीर भारी, पर शक्ति कम।
आरंभिक अवस्था में केवल वजन बढ़ता है।
पुरानी अवस्था में सांस फूलना, आलस्य, घुटनों का दर्द, मधुमेह या रक्तचाप जुड़ने लगते हैं।
हर मोटापा एक जैसा नहीं होता।
कुछ में मेद अधिक होता है।
कुछ में आम अधिक होता है।
कुछ में जल-संचय।
और कुछ में हार्मोनल कारण प्रमुख होते हैं।
इसलिए एक ही औषधि सब पर समान परिणाम नहीं देती।
कारणों पर देखें तो देर रात भोजन, बार बार खाना, मीठा-मैदा, दिन में सोना, कम चलना – ये सब मंदाग्नि को बढ़ाते हैं।
मंदाग्नि से आम बना, आम ने कफ बढ़ाया, कफ ने मेद को स्थिर कर दिया।
यही रोग की जड़ है।
अब उपाय की बात।
सुबह खाली पेट गुनगुना पानी लें, उसमें थोड़ा शहद मिला सकते हैं। यह कफहर और लघु है, स्रोतों को खोलने में सहायक है।
भोजन के बाद आधा चम्मच त्रिकटु चूर्ण गुनगुने पानी से लें। यह जठराग्नि को प्रज्वलित करता है और आम को पचाने में सहायक है।
रोज कम से कम 30 मिनट तेज चाल से चलना आवश्यक है। स्थौल्य में विहार आधा उपचार है।
औषधि चयन अवस्था अनुसार बदलता है।
त्रिफला गुग्गुल
जब मेद अधिक हो, पुरानी प्रवृत्ति हो, कब्ज या स्रोतोरोध हो।
मात्रा: 2 गोली दिन में दो बार, भोजन के बाद।
अवधि: 6–8 सप्ताह, फिर पुनर्मूल्यांकन।
यह मेदहर और स्रोतोशोधक है। तीव्र पित्त, गर्भावस्था या अल्सर में सावधानी।
मेदोहर वटी
आरंभिक अवस्था, मंदाग्नि और कफ प्रधान मोटापा।
मात्रा: 2 गोली सुबह–शाम भोजन के बाद।
यदि आम अधिक है तो अकेले पर्याप्त नहीं, पहले दीपनीय औषधि आवश्यक हो सकती है।
यदि वजन जल-संचय जैसा हो, पैरों में सूजन हो, तो दृष्टि अलग होगी।
यदि PCOS या हार्मोनल कारण हों तो केवल मेदहर औषधि पर्याप्त नहीं।
यदि 8 सप्ताह में अग्नि में सुधार न दिखे तो औषधि योजना बदलनी चाहिए।
पथ्य में जौ, मूंग, छाछ, हरी सब्जियाँ रखें। ये लघु और कफहर हैं।
मीठा, तला हुआ, ठंडे पेय, दिन में सोना और बार बार स्नैकिंग रोकना अधिक महत्वपूर्ण है। ये अग्नि को और मंद करते हैं।
यदि तेजी से वजन बढ़ रहा हो, मासिक अनियमित हो, मधुमेह, थायरॉयड, अत्यधिक सांस फूलना या सूजन हो, तो प्रत्यक्ष परामर्श आवश्यक है।
मोटापा केवल शरीर का भार नहीं, अग्नि और स्रोतों का विषय है।
जब तक अग्नि संतुलित नहीं होगी, वजन टिकाऊ रूप से नहीं घटेगा।
दवा सहायक है, पर अनुशासन और नियमितता ही आधार हैं।
हर शरीर अलग है, इसलिए उपचार भी वैयक्तिक होना चाहिए।
गुरु आयुर्वेद
वैद्य से परामर्श हेतु 7042699044
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5 days ago | [YT] | 2
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*बच्चों में भूख की कमी*
अक्सर माता-पिता कहते हैं, “डॉक्टर साहब, बच्चा खेल तो लेता है, पर खाने के नाम पर मुंह बना लेता है।”
कभी कुछ न कुछ खाते रहना, कभी टीवी देखते हुए खाना, कभी ठंडी-मीठी चीज़ों से पेट भर जाना — धीरे-धीरे बच्चा अपनी स्वाभाविक भूख पहचानना छोड़ देता है।
आयुर्वेद में भूख का सीधा संबंध अग्नि से है। जब जठराग्नि मंद होती है तो भोजन ठीक से नहीं पचता। अपचा अंश शरीर में आम बनाता है। यही आम पेट में भारीपन, गैस, जीभ पर सफेद परत और भूख की कमी का कारण बनता है।
बार-बार स्नैकिंग, पैकेट फूड, ठंडी चीज़ें — ये सब कफ दोष बढ़ाते हैं। कफ बढ़ता है तो अग्नि दबती है। अग्नि दबेगी तो भूख घटेगी। और जब पाचन ठीक नहीं होगा तो धातुओं का पोषण भी संतुलित नहीं रहेगा। इसलिए यह केवल कम खाने की आदत नहीं, बल्कि पाचन शक्ति का संकेत है।
सरल घरेलू उपाय
1. अदरक + सेंधा नमक
भोजन से 10–15 मिनट पहले बहुत छोटी मात्रा में।
यह जठराग्नि को जागृत करता है और कफ को कम करता है।
2. अजवाइन (हल्की भुनी) + थोड़ा गुड़
दिन में एक बार चुटकी भर।
यह आम और गैस कम कर पाचन को सुधारता है।
आयु अनुसार मात्रा (बहुत महत्वपूर्ण)
🔹 1–3 वर्ष
अदरक-नमक केवल जीभ लगवाएँ।
अजवाइन का पानी (¼ चम्मच अजवाइन उबालकर 1–2 चम्मच पानी)।
च्यवनप्राश: मटर के दाने जितना, सप्ताह में 3–4 दिन।
बाल चतुर्भद्र चूर्ण: 250–500 mg (चुटकी भर) शहद के साथ।
🔹 3–7 वर्ष
अदरक-नमक मटर के दाने जितना।
अजवाइन + गुड़ चुटकी भर।
च्यवनप्राश: ½ चम्मच रोज़।
बाल चतुर्भद्र चूर्ण: 1 ग्राम तक, दिन में 1–2 बार।
🔹 7 वर्ष से ऊपर
अदरक-नमक छोटी फांकी।
अजवाइन ¼ चम्मच तक।
च्यवनप्राश: 1 चम्मच।
बाल चतुर्भद्र चूर्ण: 1–2 ग्राम।
(मात्रा वजन और प्रकृति अनुसार समायोजित करें।)
ध्यान रखें
यदि बच्चा सक्रिय है, वजन सामान्य है और केवल अपेक्षा से कम खाता है, तो हर बार यह रोग नहीं होता।
लेकिन यदि वजन रुक जाए, बार-बार पेट दर्द या कीड़े हों, बच्चा थका या चिड़चिड़ा रहे — तो मूल कारण की जाँच आवश्यक है।
पथ्य
निश्चित समय पर भोजन
ताज़ा, हल्का और गर्म भोजन
मूंग की दाल, सादी खिचड़ी, थोड़ी मात्रा में घी
पर्याप्त खेल और धूप
अपथ्य
बार-बार स्नैक्स
ठंडी-मीठी चीज़ें
टीवी/मोबाइल देखते हुए खाना
जबरदस्ती खिलाना
भूख शरीर का स्वाभाविक संकेत है।
उसे दवाओं से नहीं, सही दिनचर्या और संतुलित अग्नि से जगाया जाता है।
बाल चिकित्सा में कम मात्रा, नियमितता और धैर्य ही सबसे बड़ी औषधि है।
📞 गुरु आयुर्वेद
वैद्य से परामर्श हेतु 7042699044
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6 days ago | [YT] | 1
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🌿 रसायन बल्य कैप्सूल🌿
धातु-पोषण
ओज-वृद्धि
स्त्री-पुरुष समग्र शक्ति हेतु
यह विशिष्ट संयोजन आयुर्वेद के बल्य, वृष्य और रसायन द्रव्यों से निर्मित है
अश्वगंधा, शतावरी, अकरकरा, सालम मिश्री, कौंच बीज, केसर, लौह भस्म, अभ्रक भस्म, मकरध्वज, स्वर्ण भस्म, मोती भस्म तथा शुद्ध शिलाजीत।
वैद्य परंपरा में ऐसे योग का उद्देश्य केवल तात्कालिक उत्तेजना नहीं, बल्कि सप्तधातु का क्रमिक पोषण और ओज की वृद्धि है।
🌿स्त्री-स्वास्थ्य में लाभ
• गर्भाशय और स्त्री-धातु का पोषण
• मासिक धर्म की अनियमितता में सहयोग
• प्रसवोत्तर दुर्बलता में बलवर्धन
• हार्मोन संतुलन में सहायक
• थकान, चिड़चिड़ापन और मानसिक अशक्ति में सुधार
🌿शतावरी और केसर पित्त-शमन तथा स्त्री-बल्य माने गए हैं। मोती भस्म मन की शांति में सहायक मानी जाती है।
🌿 पुरुष-स्वास्थ्य में लाभ
• वीर्य-धातु पुष्टिकरण और शुक्र वृद्धि में सहयोग
• शारीरिक शक्ति और सहनशक्ति में वृद्धि
• स्तंभन क्षमता और उत्साह में सुधार
• मानसिक तनाव से उत्पन्न दुर्बलता में सहायता
कौंच बीज, अकरकरा और शुद्ध शिलाजीत पारंपरिक रूप से वृष्य और योगवाही माने जाते हैं।
🌿 सामान्य लाभ (दोनों के लिए)
• दीर्घकालिक थकान और क्षीणता में बल
• रक्तवर्धन में सहयोग (लौह भस्म)
• स्नायु, मज्जा और ओज का पोषण (अभ्रक भस्म)
• स्मरण शक्ति और मानसिक स्थिरता में सहायक
• रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि
स्वर्ण भस्म और मकरध्वज को रसायन वर्ग में वर्णित किया गया है, जिनका उद्देश्य दीर्घकालिक पुष्टिकरण है।
🌿 सेवन विधि
1 कैप्सूल प्रातः और 1 सायं, गुनगुने दूध के साथ।
मात्रा व्यक्ति की आयु, प्रकृति और रोगावस्था अनुसार परिवर्तित हो सकती है।
• गर्भावस्था, उच्च रक्तचाप या गंभीर रोग में चिकित्सकीय परामर्श अनिवार्य।
🌿यह योग त्वरित उत्तेजना के लिए नहीं, बल्कि गहन धातु-पोषण और ओज-वृद्धि के लिए है। उचित परामर्श, संतुलित आहार और संयमित जीवनचर्या के साथ ही इसका पूर्ण लाभ प्राप्त होता है।
🌿गुरु आयुर्वेद🌿
कैप्सूल हेतु 7042699044
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1 week ago | [YT] | 1
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🌿 उच्च रक्तचाप का आयुर्वेदिक उपचार🌿
उच्च रक्तचाप तब होता है जब रक्त का दबाव लगातार बढ़ा रहता है।
आयुर्वेद के अनुसार यह स्थिति मुख्यतः वात के असंतुलन, पित्त की अधिकता, रक्त की उष्णता और मानसिक तनाव के कारण बनती है।
इसका उपचार दवा के साथ सही भोजन, दिनचर्या और मानसिक शांति से किया जाता है।
औषधियाँ
सर्पगंधा वटी
रात्रि में भोजन के बाद एक गोली गुनगुने जल के साथ लें।
यह मन को शांत करती है, बेचैनी कम करती है और रक्तचाप संतुलन में रखने में सहायक है।
अधिक मात्रा बिना वैद्य की सलाह न लें।
अर्जुनारिष्ट
भोजन के बाद 15 से 20 मि.ली. अर्जुनारिष्ट समान मात्रा में जल मिलाकर दिन में दो बार लें।
यह हृदय को बल देता है और रक्त संचार को नियमित करता है।
ब्राह्मी वटी
भोजन के बाद एक गोली दिन में दो बार लें।
यह तनाव, घबराहट और अनिद्रा में लाभ देती है, जिससे रक्तचाप नियंत्रित रहता है।
प्रवाल पिष्टी
125 मि.ग्रा. प्रवाल पिष्टी शहद या घी के साथ दिन में एक बार लें।
यह पित्त को शांत करती है और हृदय पर शीतल प्रभाव डालती है।
घरेलू आयुर्वेदिक उपाय
लौकी का रस
सुबह खाली पेट 20 से 30 मि.ली. ताजी लौकी का रस लें।
यह रक्तचाप को स्वाभाविक रूप से कम करने में सहायक है।
कड़वी लौकी का प्रयोग कभी न करें।
आँवला रस
सुबह खाली पेट 20 मि.ली. आँवला रस लें।
यह रक्त को शुद्ध करता है और हृदय को पोषण देता है।
लहसुन
प्रातः एक कली लहसुन चबाकर ऊपर से गुनगुना जल पिएँ।
यह रक्त नलिकाओं को लचीला बनाए रखने में सहायक है।
गुनगुना जल
दिनभर गुनगुना जल पीने से रक्त प्रवाह संतुलित रहता है।
आहार और दिनचर्या
परहेज़
अधिक नमक, अचार, तले हुए पदार्थ, अधिक चाय-कॉफी, देर रात जागना, क्रोध और चिंता।
अपनाएँ
लौकी, तोरी, परवल, कद्दू जैसी सब्ज़ियाँ, हल्का और सादा भोजन, नियमित समय पर भोजन और नींद।
प्राणायाम
प्रतिदिन सुबह खाली पेट अनुलोम-विलोम और भ्रामरी का अभ्यास करें।
यह मन को शांत करता है और रक्तचाप संतुलन में सहायक होता है।
🌿 गुरु आयुर्वेदा 🌿
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1 week ago | [YT] | 3
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आयुर्वेद से पित्त की थैली में मिला लाभ।
🌱गुरु आयुर्वेदा 🌱
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2 weeks ago (edited) | [YT] | 7
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श्याम केशामृत तेल का अनुभव ।
🌱गुरु आयुर्वेदा 🌱
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2 weeks ago | [YT] | 8
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भावप्रकाश निघण्टु पढ़ते हुए आज एक अच्छी औषधि मिली आप सब से साझा कर रहा हूँ
बच्चों में पेट के कीड़े (कृमि) हेतु🌿
आयुर्वेद के अनुसार बच्चों में कृमि (पेट के कीड़े) होने का मुख्य कारण मंदाग्नि (पाचन की कमजोरी) और खान-पान में लापरवाही है।
प्रमुख लक्षण (कैसे पहचानें?)
• सोते समय मुँह से लार टपकना।
• सोते समय दांत पीसना।
• गुदा मार्ग (मल द्वार) में खुजली होना, विशेषकर रात में।
• पेट में बार-बार दर्द होना।
• भूख कम लगना या बहुत ज्यादा लगना।
• वजन का न बढ़ना और चेहरे पर पीलापन या सफेद चकत्ते दिखना।
• चिड़चिड़ापन और शरीर में सुस्ती रहना।
📖 (चरक संहिता):
"विडङ्गं कृमिघ्नानां श्रेष्ठम्।"
अर्थात् सभी कृमिनाशक औषधियों में वायविडंग सबसे उत्तम है।
💊 औषधि प्रयोग एवं मात्रा:
(वायविडंग चूर्ण को शहद या गुनगुने पानी के साथ सुबह खाली पेट देना चाहिए)
• 2 से 5 वर्ष: 125 मिलीग्राम (1 छोटी चुटकी) – अधिकतम 3 दिन तक।
• 5 से 10 वर्ष: 250 मिलीग्राम – 3 से 5 दिन तक।
• 10 से 14 वर्ष: 500 मिलीग्राम – 5 दिन तक।
⚠️ जरूरी सावधानियाँ:
1. 2 साल से छोटे बच्चों को बिना वैद्य की सलाह के औषधि न दें।
2. बुखार, दस्त या बहुत ज्यादा कमजोरी होने पर यह दवा न दें।
3. उपचार के दौरान मीठा, दूध, दही और बाहर का जंक फूड बंद कर देना चाहिए।
4. व्यक्तिगत अवस्था के अनुसार औषधि की मात्रा में बदलाव संभव है, अतः स्थानीय वैद्य का परामर्श उचित है।
🕉️🕉️🕉️
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2 weeks ago | [YT] | 3
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🌿 त्रिफला (द्रव्य एक, अनुपात अनेक)🌿
आयुर्वेद में त्रिफला कोई साधारण चूर्ण नहीं है।
यह एक ऐसा योग है, जिसका प्रभाव द्रव्य से अधिक उसके अनुपात, मात्रा और सेवन काल पर निर्भर करता है।
आंवला, हरड़ और बहेड़ा
तीनों अपने-अपने गुणों में पूर्ण हैं।
• हरड़ – वातहर, दीपन, रेचक
• बहेड़ा – कफहर, कास-श्वास हित
• आंवला – पित्तहर, रसायन, रक्तशोधक
इन्हीं गुणों के कारण आयुर्वेद में कहा गया है कि
दोष के अनुसार त्रिफला का अनुपात बदला जा सकता है।
1️⃣ सम मात्रा त्रिफला (1 : 1 : 1)
यह त्रिफला का सामान्य, संतुलित और सौम्य रूप है।
उपयोग
• सामान्य स्वास्थ्य संरक्षण
• रसायन प्रयोग
• बच्चों, वृद्धों और दुर्बल व्यक्तियों में
• दीर्घकालीन सेवन हेतु
यह अनुपात शरीर पर धीरे और सुरक्षित रूप से कार्य करता है।
2️⃣ आंवला प्रधान त्रिफला (1 : 2 : 3 या 1 : 1 : 3)
जहाँ पित्त प्रबल हो, वहाँ आंवला की मात्रा बढ़ाई जाती है।
उपयोग
• अम्लपित्त, जलन, गर्मी
• रक्तदोष
• त्वचा एवं नेत्र विकार
• मेद वृद्धि व कमजोरी
यह अनुपात शीतल, पोषक और रसायन प्रभाव देता है।
3️⃣ हरड़ प्रधान त्रिफला (3 : 2 : 1)
वात और कब्ज प्रधान अवस्था में हरड़ की मात्रा बढ़ाई जाती है।
उपयोग
• पुरानी व जिद्दी कब्ज
• गैस, उदर में वायु
• वात विकार
• आंतों की शुद्धि
यह अनुपात अधिक रेचक होता है, इसलिए मात्रा कम रखी जाती है।
4️⃣ बहेड़ा प्रधान त्रिफला (1 : 3 : 1)
कफ विकारों में बहेड़ा की प्रधानता दी जाती है।
उपयोग
• खांसी, बलगम
• कास-श्वास
• गले व फेफड़ों के रोग
यह अनुपात कफहर प्रभाव से कार्य करता है।
5️⃣ मिश्रित दोष में (2 : 1 : 2 आदि)
जब दोष स्पष्ट न हों या मिश्रित हों,
तो वैद्य अपनी युक्ति प्रमाण से संतुलित अनुपात का चयन करता है।
सेवन काल का प्रभाव
• प्रातः शहद या गुड़ के साथ
→ पोषक, बलवर्धक
• रात्रि में गर्म पानी या दूध के साथ
→ रेचक, शोधन
सेवन अवधि
त्रिफला का सेवन
लगातार लगभग 90 दिन कर के 15–20 दिन का विराम देना उचित है।
इससे शरीर पर संतुलित प्रभाव बना रहता है।
सबसे अच्छा त्रिफला घर का बनाया होता है अगर ना बना सके तो
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3 weeks ago | [YT] | 6
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स्वर्णप्राशन से मिला लाभ।
🌱 गुरु आयुर्वेदा 🌱
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3 weeks ago (edited) | [YT] | 2
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🌿 मुखपाक (Mouth Ulcers)
🌿 मुखपाक क्या है?
आयुर्वेद के अनुसार मुख के भीतर उत्पन्न होने वाले
दाह (जलन), पाक (सूजन/पकना), शूल (दर्द) अथवा व्रण (घाव)
को मुखपाक कहा जाता है।
यह रोग मुख्यतः पित्त दोष के प्रकोप से उत्पन्न होता है।
रोग की अवस्था और व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार इसमें
कफ या वात का अनुबंध भी पाया जा सकता है।
इसी कारण मुखपाक को केवल “सामान्य मुँह के छाले” मानना
एक अधूरा दृष्टिकोण है।
वास्तव में यह शरीर के आंतरिक पित्त असंतुलन
या रक्त-दुष्टि का बाह्य लक्षण होता है।
🌿 मुखपाक होने के प्रमुख कारण
🌿 अत्यधिक तीखा, खट्टा एवं लवण (नमक) प्रधान भोजन
🌿 अत्यधिक गर्म और उष्ण पदार्थों का सेवन
🌿 कब्ज, मंदाग्नि या पाचन दोष
🌿 मानसिक तनाव तथा पर्याप्त नींद का अभाव
🌿 पित्त प्रधान प्रकृति वाले व्यक्तियों में इसकी संभावना अधिक
🌿 आयुर्वेदिक औषधियाँ
(दोष व अवस्था के अनुसार)
🌿 खदिरादि वटी
🌿 उपयोगिता:
जब मुखपाक के साथ कफ-पित्त का संयोग हो,
मुख से दुर्गंध आती हो
या बार-बार छाले होने की प्रवृत्ति हो।
🌿 सेवन विधि:
1–2 वटी दिन में 2–3 बार
मुँह में रखकर धीरे-धीरे चूसें।
🌿 ध्यान दें:
यह औषधि स्थानीय रूप से कार्य करती है,
अतः इसे न निगलें और न चबाएँ।
🌿 इरिमेदादि तैल
🌿 उपयोगिता:
यदि छालों के साथ मसूड़ों में सूजन हो,
हल्का रक्तस्राव हो
और मुख दुर्गंध अधिक हो।
🌿 प्रयोग विधि:
5–10 बूंद तैल
गुनगुने जल में मिलाकर
कवल / गण्डूष (कुल्ला) करें।
🌿 सावधानी:
तीव्र दाह एवं अत्यधिक पित्त प्रधान अवस्था में
इसका प्रयोग न करें,
क्योंकि इसका स्वभाव उष्ण है।
🌿 वासा स्वरस
🌿 उपयोगिता:
जब छालों में तीव्र जलन हो,
मुँह में अधिक गर्मी लगे
और प्यास अधिक रहती हो।
यह औषधि पित्त-शामक एवं शीतल मानी जाती है।
🌿 मात्रा:
10–20 मिली स्वरस
समान मात्रा में मिश्री युक्त जल के साथ
5–7 दिन तक।
🌿 सावधानी:
वासा स्वभाव से रूक्ष होती है,
अतः इसे लंबे समय तक
या वात प्रधान रोगी को नहीं देना चाहिए।
🌿 पञ्चवल्कल कषाय
🌿 उपयोगिता:
जब छालों से स्राव हो,
दुर्गंध हो
और घाव भरने में अधिक समय लग रहा हो।
🌿 प्रयोग विधि:
20–30 मिली कषाय
समान मात्रा गुनगुने जल में मिलाकर
दिन में दो बार कुल्ला करें।
यह कषाय व्रण शोधन एवं व्रण रोपण में सहायक है।
इसे निगलना नहीं
🌿 पथ्य एवं अपथ्य
🌿 पथ्य (लाभकारी)
🌿 सादा, सुपाच्य एवं शीतल स्वभाव का भोजन
🌿 शुद्ध घृत एवं दूध (सहन अनुसार)
🌿 नारियल जल एवं पर्याप्त मात्रा में जल
🌿 अपथ्य (वर्जित)
🌿 मिर्च-मसाले, अचार, अधिक खट्टे पदार्थ
🌿 चाय, कॉफी, मद्यपान
🌿 तंबाकू, गुटखा एवं धूम्रपान
🌿 बार-बार होने वाले मुखपाक
शरीर में संचित आम
या रक्त-दुष्टि का संकेत हो सकते हैं।
🌿 केवल स्थानिक औषधि पर्याप्त नहीं होती,
जठराग्नि का संतुलन भी आवश्यक है।
🌿 यदि छाले लंबे समय तक ठीक न हों
या उनसे रक्तस्राव हो,
तो योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
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3 weeks ago | [YT] | 3
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