Enlightened mystic Anant Sri carries the eternal wisdom of the buddhas which is a simple science of transformation.
He is a flowing river of buddhahood where we can find the true essence of eternal life ...
His only concern is the suffering of humanity and end of suffering through the ultimate understanding of our true nature which brings peace, love, happiness and harmony in daily living...


Anant Sri

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Anant Sri Podcast - डिकोडिंग महाशिवरात्रि
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अनंत श्री पॉडकास्ट के इस एपिसोड में महाशिवरात्रि और शिव से जुड़े कई रहस्यों पर चर्चा की गई है (0:00)। अनंत श्री ने शिव और शिवलिंग के महत्व को समझाया है, जहाँ शिवलिंग अमूर्त स्थिरता का प्रतीक है (1:56-2:09)। उन्होंने शिव की प्रतिमा में मौजूद विभिन्न प्रतीकों जैसे नीले रंग (2:49), खुली जटाएं (3:00), त्रिशूल (4:19), डमरू (6:21), और चंद्रमा (7:10) का गहरा अर्थ बताया।

मुख्य बातें:
शिव और शिवलिंग का महत्व: शिवलिंग स्थिरता और शांति का प्रतीक है (1:56-2:09)। शिव की मूर्ति शून्यता और चरम चेतना को दर्शाती है, जहाँ उनका नीला रंग आकाश की शून्यता, जटाएं मन की उलझन, गंगा चेतना का प्रवाह, त्रिशूल वर्तमान में ठहरने का प्रतीक, डमरू सृजन का नाद, और चंद्रमा शीतलता का प्रतीक है (2:45-7:40)।
महाशिवरात्रि जागरण: रात भर जागने की प्रथा को अर्ध-सत्य बताया गया है। सहज जागरण ही श्रेयस्कर है, क्योंकि रात्रि प्रकृति के विश्राम का समय है और इस समय ध्यान अधिक प्रभावी होता है (8:01-10:06)।
शिवलिंग पर त्याज्य वस्तुएं: शिव को बेलपत्र, भांग, और धतूरा जैसी त्याज्य वस्तुएं अर्पित करने का अर्थ यह है कि जो व्यक्ति परम अवस्था को प्राप्त कर चुका है, उसके लिए संसार में कुछ भी त्याज्य नहीं है। वह सभी को प्रेम और स्वीकार करता है (10:21-12:50)। भांग का प्रतीकवाद उन लोगों के लिए है जो कल्पनाओं और नशे में जीते हैं, और शिव उन सबको स्वीकार करते हैं (13:15-15:49)।
शिव-पार्वती विवाह: इसे वैराग्य (शिव) और शक्ति (पार्वती) के मिलन के रूप में एक प्रतीकात्मक कथा बताया गया है। यह दर्शाता है कि विपरीत ध्रुवों का मिलन संभव है और शक्ति ही चेतना को सक्रिय करती है (17:49-21:02)। पार्वती समय और संभावनाओं की निरंतरता का प्रतिनिधित्व करती हैं (22:12-22:59)।
शिव का तांडव: शिव का नृत्य (तांडव) सृजन और विनाश दोनों का प्रतीक है, जो जीवन में लयबद्धता और निरंतरता को दर्शाता है। यह दिखाता है कि सब कुछ नृत्यमय है, चाहे वह सृजन हो या विध्वंस (23:02-27:21)।
पुरुष और स्त्री की साधना: भारतीय दर्शन में पुरुष की दृष्टि में मातृत्व चरम पर होता है, जबकि स्त्री के लिए पति अंततः परमात्मा का स्वरूप बन जाता है। यह जेंडर भेदभाव नहीं, बल्कि गहरे मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य हैं (28:08-29:37)।
शिव की तीसरी आँख: यह अतीत और भविष्य से मुक्त होकर वर्तमान में ठहरने की ऊर्ध्वगामी दृष्टि का प्रतीक है। शिव के प्रतीकों में तीसरा बिंदु हमेशा ट्रांसेंडेंस या ऊर्ध्वगमन को दर्शाता है (30:53-32:44)।
शिव-पार्वती विवाह और लोक कल्याण: शिव का विवाह लोक कल्याण के लिए नहीं, बल्कि प्रेम के लिए था, और पार्वती के आने से उनकी वेदना कम हुई (33:43-34:57)। प्रेम ही सभी अराजकताओं का एंटीडोट है और उच्चतम प्रेम की तरंगें पूरे विश्व को प्रभावित कर सकती हैं (38:22-39:15)।
हलाहल का ग्रहण: शिव का हलाहल ग्रहण करना भी प्रेम की ही अवस्था है, जहाँ प्रेम से भरा व्यक्ति जीवन की अराजकता और विषैली परिस्थितियों को संभाल लेता है (39:21-40:55)।
देवताओं की श्रेष्ठता पर बहस: कथाएं बताती हैं कि कोई भगवान छोटा या बड़ा नहीं है; सभी एक-दूसरे के पूज्य और स्वीकार्य हैं। समाज में इस पर बहस करना अर्थ का अनर्थ है (41:12-44:01)।
विज्ञान भैरव तंत्र: शिव ने पार्वती के समक्ष 'विज्ञान भैरव तंत्र' जैसे गहन सूत्र रखे, जो मानवीय चेतना को बदलने की कीमिया है। दुर्भाग्य से, समाज ने इसे छुपाकर केवल चालीसाओं को प्रचलित किया है (44:05-47:12)।
महामृत्युंजय मंत्र और मृत्यु का स्वीकार: शिव को महाकाल और मृत्यु का देवता कहा जाता है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप मृत्यु से बचने के लिए नहीं, बल्कि मृत्यु को स्वीकार करने के लिए है। जब व्यक्ति मृत्यु का स्वीकार कर लेता है, तो उसकी आंतरिक उपचार शक्तियां सक्रिय हो जाती हैं (47:37-52:19)।
भक्ति के प्रकार: अंतर्मुखी व्यक्ति शिव का उपासक होगा, जो स्थिरता और शांति चाहेगा। बहिर्मुखी व्यक्ति शक्ति का साधक होगा, जो सृजन और विस्तार चाहेगा। जो दोनों का संतुलन चाहते हैं, वे शिव-शक्ति दोनों के भक्त होते हैं, जो मध्य मार्ग को तलाशते हैं (52:19-54:47)।

3 days ago | [YT] | 18

Anant Sri

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When AI ( Artificial Intelligence) touches AI ( Anant Intelligence)

4 days ago | [YT] | 96

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Anant Sri Podcast- प्रियजन की मृत्यु के बाद प्रेम की पुकार
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यह पॉडकास्ट मृत्यु के बाद प्रेम, भय और जीवन में आगे बढ़ने के बारे में है। अनंत श्री, एक आध्यात्मिक गुरु, श्रोताओं के प्रश्नों का उत्तर देते हैं कि कैसे किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद होने वाले भय और दर्द को दूर किया जाए।

मुख्य बातें:

मृत्यु के बाद प्रेम का विस्तार (1:38-1:46): अनंत श्री बताते हैं कि प्रियजन की मृत्यु के बाद होने वाले दर्द के बावजूद, व्यक्ति को प्रेम के लिए खुला रहना चाहिए क्योंकि प्रेम अनंत है और इसका कोई अंत नहीं होता।
भय पर विजय (4:42-6:20): वह समझाते हैं कि मृत्यु का भय स्वाभाविक है, लेकिन हमें इससे रुकना नहीं चाहिए। प्रेम को जीवन में कभी इनकार नहीं करना चाहिए, भले ही यह हमें घायल करे।
आसक्ति और विरक्ति से परे (15:01-16:04): अनंत श्री आसक्ति (पकड़ना) और विरक्ति (छोड़ना) दोनों को अनावश्यक बताते हैं। वे 'वीतरागिता' की स्थिति में रहने की सलाह देते हैं, जहाँ व्यक्ति न कुछ पकड़ता है और न कुछ छोड़ता है, बल्कि सहज रूप से जीवन जीता है।
मृत्यु जीवन का सम्मान सिखाती है (9:38-10:04): मृत्यु हमें जीवन का अत्यधिक सम्मान करना सिखाती है। जो चला गया, उसके साथ बिताए गए पलों का सम्मान करते हुए, हमें वर्तमान में मौजूद लोगों के साथ जीवन को पूरी तरह से जीना चाहिए।
प्रेम का पुनर्जन्म (27:52-28:23): वह प्रेम को एक विद्युत धारा के समान बताते हैं, जो एक बल्ब (प्रियजन) के फ्यूज होने पर भी प्रवाहित होती रहती है, जिससे नए बल्ब (नए प्रेम संबंध) जल सकते हैं। समाज अक्सर इस प्रेम को मारना चाहता है, लेकिन प्रेम की जीवंतता इतनी प्रचंड है कि यह हमेशा नए रूप में प्रकट होता है।
जीवंतता का महत्व (31:11-31:16): अनंत श्री जोर देते हैं कि व्यक्ति जीवंतता से जुड़ता है, न कि केवल शरीर या पदार्थ से। इसलिए, जब कोई प्रियजन चला जाता है, तो भी प्रेम की जीवंतता बनी रहती है और नए संबंधों को आकर्षित करती है।
सतगुरु और जीवंत गुरु (33:58-34:14): वह हमेशा एक जीवंत गुरु के सानिध्य में रहने की सलाह देते हैं, क्योंकि उनकी उपस्थिति शब्दों या ऑडियो-वीडियो से कहीं अधिक शक्तिशाली होती है।

यह पॉडकास्ट श्रोताओं को जीवन में दर्द और हानि के बावजूद प्रेम और जीवंतता के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

1 week ago | [YT] | 18

Anant Sri

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अभी 7 PM 🕖 पर होने लाइव सेशन public होगा. सभी के लिये open रहेगा.
- अनंत संघ

1 week ago | [YT] | 10

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Anant Sri Podcast- Osho - एक बाढ़ वाली नदी की summary और मित्रों के कमेंट्स की ai summary सभी मित्रों के लिये-
Osho as a philosopher vs. Satguru (3:19-6:29): Anant Sri believes that categorizing Osho as either a philosopher or a Satguru (true guru) is unnecessary. He asserts that Osho was both, offering philosophical insights and guiding people to truth without relying on miraculous displays.
Osho's evolving teachings and "God" concept (6:42-8:07): Osho's teachings continuously evolved, adapting to people's needs. Anant Sri clarifies that Osho's use of the term "God" was not about a divine being but rather about someone who is "blessed" or "fortunate."
Osho's meditation techniques (8:08-9:40): Initially, Osho emphasized effortless meditation and non-doership. However, observing people's difficulty with non-action, he later introduced dynamic meditations that involved active participation.
Osho as a "flooding river" of experiments (10:32-14:13): Anant Sri metaphorically describes Osho as a "flooding river" of experiments, bringing both chaos and fertile ground. This chaotic approach, which broke down old traditions, explains why some people found his methods disorderly, while others found them transformative.
Criticism and misinterpretation of Osho (14:15-19:07): Anant Sri addresses the criticism Osho faced, particularly from those who misinterpreted his teachings or sought to elevate themselves by disparaging him. He suggests that such critics often borrowed heavily from Osho's ideas themselves.
Osho's approach to sex and taboo subjects (24:29-29:45): The discussion touches upon Osho's controversial stance on sex, which some perceived as promoting "free sex." Anant Sri explains that Osho aimed to address societal repression and help people transcend bodily limitations, emphasizing that he personally remained untainted by the criticisms.
The rise and fall of Rajneeshpuram (46:42-50:06): Anant Sri views the establishment and dissolution of Rajneeshpuram as a "play" orchestrated by existence itself, serving as a teaching that emphasized the unimportance of organizations and structures in spiritual awakening.
Osho's impact on making meditation accessible (33:03-36:56): Osho is credited with demystifying meditation and making it accessible to common people, breaking it free from the confines of monasteries and secret practices. This widespread availability of spiritual teachings, however, challenged those who sought to commercialize spirituality.
The "Zorba the Buddha" concept (37:56-43:35): Anant Sri explains Osho's "Zorba the Buddha" concept as a balance between materialism and spiritual awareness, emphasizing the importance of living a full, conscious life without renouncing wealth or worldly engagement

2 weeks ago | [YT] | 15