अन्नकंण आनंदछंण

Annkan Anandchhan - जीवन में 2 चीजें कभी व्यर्थ ना जाने दें .. अन्नकंण और आनंदछंण 🙏🔱🚩

शरीर कर्म का कार्य है और कर्म शरीर का कारण है, देह और कर्म का बीज (अन्नकंण)..नवीन उत्पत्ति..प्रवाह - सन्तानरूप ..नादि संबंध है।

आनंद के स्रोत को पहचानना ही अध्यात्म का चरम है, यह आपके हमारे अंदर ही है। कोई भी व्यक्ति जिस दिन आनंदित रहने के स्रोत को ढूंढ़ लेगा, उसी दिन उसे सच्ची आध्यात्मिकता प्राप्त हो जाएगी। जीवन परमानंद का अंश है, मानव अंश है परमपिता अंशी हुआ। इस आनंद की प्राप्ति के लिए परमपिता ने वैविध्यपूर्ण संरचना की है। हमारी ज्ञानेंद्रियों से मन-मस्तिष्क प्रभावित होता है। इसका आशय हुआ कि ज्ञानेंद्रियां यदि आनंद संग्रहित कर रही हैं तो जीवन में आनंद और यदि दुख संग्रहित कर रही हैं तो जीवन कष्टदायी नर्क जैसा हो जाता है। ज्ञानेंद्रियों में आंख, कान, नाक, जीभ, और त्वचा को शामिल किया जाता है। मनुष्य को चाहिए कि वह आनंद के लिए इन सारी ज्ञानेंद्रियों से संतुलन, समन्वय और सामंजस्य स्थापित करके चले 🙏🚩

राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे 🚩
सहस्रनाम तत्तुल्यं, राम नाम वरानने 🚩
🔱राम राम राम राम राम🔱


अन्नकंण आनंदछंण

राम राम 🙏🚩🐻 जामवंत: वो योद्धा जिनकी जवानी का अंदाज़ा भी असंभव है!

रामायण में कई महायोद्धा हैं, लेकिन एक नाम ऐसा है जो शांत है… गूढ़ है… और अकल्पनीय शक्ति का प्रतीक है — जामवंत।

उनके बारे में ग्रंथों में ज्यादा विस्तार नहीं मिलता, लेकिन जो थोड़ा-सा मिलता है… वही कल्पना से परे है।

🌅 सतयुग से आए थे जामवंत!

जामवंत कोई साधारण वानर नहीं थे। उनकी उत्पत्ति सीधे ब्रह्माजी से मानी जाती है।
और याद रखिए — वे सतयुग के थे!

सतयुग के योद्धाओं की शक्ति की तुलना किसी और युग से नहीं की जा सकती।
जिसका जन्म स्वयं ब्रह्मा से हो… उसकी ताकत का अनुमान कैसे लगाया जाए?

⚔ रावण और मेघनाद को पाद प्रहार से मूर्छित!

रामचरितमानस में उल्लेख मिलता है कि जामवंत ने रावण और मेघनाद दोनों को अपने पाद प्रहार (पैर के आघात) से मूर्छित कर दिया था।

ज़रा सोचिए —
रावण… जिसे देवता भी नहीं हरा पाए।
मेघनाद… जिसने इंद्र को बंदी बना लिया था।

और जामवंत ने उन्हें पैरों से धराशायी कर दिया!

वो भी वृद्धावस्था में।
तो युवावस्था में उनका बल कैसा रहा होगा?

🌊 समुद्र मंथन में अकेले घुमा दिया मंदराचल!

जब देवता और दैत्य मिलकर समुद्र मंथन कर रहे थे, तब मंदराचल पर्वत को घुमाना बेहद कठिन हो रहा था।

लेकिन जामवंत ने अपनी जवानी के जोश में अकेले ही मंदराचल को घुमा दिया!

क्या आप कल्पना कर सकते हैं उस शक्ति की…
जो एक पर्वत को अकेले घुमा दे?

🌍 वामन अवतार और सात परिक्रमा – सिर्फ 7 पल में!

जब भगवान ने विराट रूप लेकर स्वर्ग को नापा, और पृथ्वी को नापने के लिए पैर उठाया —
तभी जामवंत ने केवल 7 पल में पृथ्वी की 7 परिक्रमा कर ली।

एक पल लगभग 24 सेकंड का माना जाता है।

यानी कुछ ही मिनटों में पृथ्वी की सात परिक्रमा!

यह गति शब्दों से परे है।

🌊 6 मन्वंतर की आयु… फिर भी 90 योजन छलांग!

जब सीता माता की खोज के लिए समुद्र लांघने की बात हुई, तब जामवंत बोले:

> “मैं तो बहुत वृद्ध हो गया हूँ, फिर भी 90 योजन तक जा सकता हूँ।”

उनकी आयु उस समय 6 मन्वंतर बताई जाती है।
एक मन्वंतर = करोड़ों वर्षों का काल!

इतनी आयु के बाद भी 90 योजन…
तो युवावस्था में क्या वे पूरे ब्रह्मांड को नाप सकते थे?

⚔ द्वापर में 28 दिन तक युद्ध!

द्वापर युग में उनका युद्ध स्वयं श्रीकृष्ण से हुआ।

और उन्हें परास्त करने के लिए श्रीकृष्ण को 28 दिन तक युद्ध करना पड़ा।

स्वयं भगवान को जिसे हराने में 28 दिन लग जाएँ…
उसकी शक्ति की सीमा क्या होगी?

🏔 मेरु का श्राप

जब अंगद ने पूछा कि आपका बल क्षीण कैसे हुआ?

तब जामवंत ने बताया—

पृथ्वी की परिक्रमा करते समय उनका नाखून महामेरु पर्वत से टकरा गया और उसका शिखर खंडित हो गया।

मेरु ने इसे अपमान समझकर उन्हें श्राप दिया—

> “तुम सदा वृद्ध रहोगे, और तुम्हारा बल क्षीण हो जाएगा।”

🙏 सबसे बड़ी बात – शक्ति थी, पर अहंकार नहीं

इतनी अद्भुत शक्ति…
इतनी असंभव गति…
इतनी प्राचीन आयु…

फिर भी जामवंत में रत्ती भर भी घमंड नहीं था।

वे स्वयं समुद्र नहीं लांघे,
बल्कि हनुमान को उनकी शक्ति का स्मरण कराया।

यही सच्चा महायोद्धा होता है —
जो स्वयं महान हो, पर दूसरों को महान बनाए।

🔥 जामवंत हमें सिखाते हैं —
शक्ति का शोर नहीं होता।
वह मौन रहती है… और समय आने पर इतिहास रच देती है।

जय श्रीराम 🙏
#ram #hanuman #shiv 🔱🚩🙏🕉🏹🇮🇳

1 day ago | [YT] | 1

अन्नकंण आनंदछंण

राम राम 🙏🚩दुनिया में रहने की सबसे अच्छी दो जगह •••
या तो किसी के दिल में,
या किसी के आशीर्वाद, मंगल कामनाओं में🎯
🚩जय बजरंग बली 🚩

1 week ago | [YT] | 5

अन्नकंण आनंदछंण

🚩राम राम 🙏🌿 दक्ष प्रजापति की 60 कन्याएँ और सृष्टि का विराट विस्तार 🌿

(श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार)

।। श्रीशुकदेव जी कहते हैं ।।
राजन् परीक्षित!
सृष्टि के विस्तार हेतु जब ब्रह्मा जी ने विशेष योजना बनाई, तब उन्होंने प्रजापति दक्ष को आदेश दिया कि वे सृष्टि को वंश परंपरा द्वारा आगे बढ़ाएँ। उसी दिव्य योजना के अंतर्गत दक्ष प्रजापति और उनकी धर्मपत्नी असिक्नी (पञ्चजनी) के गर्भ से साठ (60) कन्याओं का जन्म हुआ।

ये कन्याएँ साधारण नहीं थीं—
इन्हीं के माध्यम से देवता, ऋषि, नक्षत्र, काल, कर्म और समस्त लोकव्यवस्था का विस्तार हुआ।
तीनों लोकों की जनसंख्या, नियम और गति इन्हीं कन्याओं की संतानों पर आधारित है।



🌸 दक्ष कन्याओं का विवाह-विभाजन

दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्रियों का विवाह सृष्टि के प्रधान आधार-स्तंभों से किया—
• 🔱 10 कन्याएँ — धर्म को
• 🌿 13 कन्याएँ — महर्षि कश्यप को
• 🌙 27 कन्याएँ — चन्द्रदेव को (यही 27 नक्षत्र हैं)
• 👻 2 कन्याएँ — भूत को
• 🔥 2 कन्याएँ — अंगिरा को
• 🌬 2 कन्याएँ — कृशाश्व को
• 🦅 4 कन्याएँ — तार्क्ष्य (कश्यप) को

यही विवाह-संरचना काल, कर्म और प्रकृति की गति निर्धारित करती है।



📜 धर्म की 10 पत्नियाँ और सृष्टि के मूल तत्व

धर्मदेव को प्राप्त दस कन्याओं से दैवी गुणों और प्राकृतिक शक्तियों का जन्म हुआ—
1. भानु
• पुत्र: देवऋषभ
• पौत्र: इन्द्रसेन
2. लम्बा
• पुत्र: विद्योत (बिजली)
• मेघगण उत्पन्न हुए
3. ककुभ्
• पुत्र: संकट
• पौत्र: पृथ्वी के दुर्गों के अधिष्ठाता देव
4. जामि
• पुत्र: स्वर्ग
• पौत्र: नन्दी
5. विश्वा
• संतति: विश्वेदेव गण
6. साध्या
• संतति: साध्यगण
• पुत्र: अर्थसिद्धि
7. मरुत्वती
• पुत्र: मरुत्वान
• पौत्र: जयन्त (जो भगवान वासुदेव के अंश उपेन्द्र कहलाते हैं)
8. मुहूर्ता
• मुहूर्तों के अधिष्ठाता देव
• जो कर्मानुसार फल प्रदान करते हैं
9. संकल्पा
• पुत्र: संकल्प
• पौत्र: कामदेव
10. वसु
• संतति: आठ वसु



✨ आठ वसुओं का दिव्य परिचय

आठ वसु सृष्टि की भौतिक एवं ऊर्जात्मक रचना के आधार हैं—

द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, वसु और विभावसु
• 🔥 अग्नि से कृत्तिकाओं द्वारा
👉 भगवान स्कन्द (कार्तिकेय) का जन्म हुआ
• 🛠 वसु की पत्नी अंगीरसी से
👉 शिल्पकला के अधिपति भगवान विश्वकर्मा प्रकट हुए



🔥 अन्य प्रमुख वंश परंपराएँ

🔱 भूत और सरूपा
• इनसे कोटि-कोटि रुद्रगण उत्पन्न हुए
• जिनमें 11 मुख्य रुद्र विशेष रूप से पूज्य हैं

🌾 अंगिरा की पत्नियाँ
• स्वधा से → पितृगण उत्पन्न हुए
• सती ने अथर्वांगिरस वेद को पुत्र रूप में स्वीकार किया



🌺 निष्कर्ष

यह वंशावली केवल पारिवारिक विवरण नहीं है—
यह काल, कर्म, प्रकृति, देवत्व और चेतना की रूपरेखा है।
दक्ष प्रजापति की कन्याएँ ही वह सेतु हैं,
जिनसे नक्षत्रों की चाल, देवताओं की शक्ति और मनुष्य का भाग्य जुड़ा हुआ है।

इसी दिव्य योजना पर संपूर्ण सृष्टि टिकी हुई है।



🙏
।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

#sanatandharma #hindu #hinduism #religious #sanatani #religion #ram #hanuman #shiv🔱🚩🙏

1 week ago | [YT] | 1

अन्नकंण आनंदछंण

राम राम 🙏🔱 देवी महात्म्य : मातृशक्तियों का प्रादुर्भाव और अधर्म का समूल नाश 🔱

(मार्कण्डेय पुराण, अध्याय 5–10 पर आधारित)

महिषासुर के वध के पश्चात जब सम्पूर्ण त्रिलोक में शांति का संचार हुआ, तब देवताओं ने भगवती दुर्गा की स्तुति कर उनसे यह वर प्राप्त किया कि “जब-जब अधर्म प्रबल होगा, तब-तब देवी अपने विभिन्न स्वरूपों में प्रकट होकर धर्म की रक्षा करेंगी।”
यही वरदान आगे चलकर शुम्भ-निशुम्भ वध की दिव्य लीला का कारण बना।

🌑 अधर्म का पुनः उत्कर्ष

महिषासुर के पश्चात शुम्भ और निशुम्भ नामक दैत्य उत्पन्न हुए। बल, तप और अहंकार से उन्मत्त होकर उन्होंने इंद्र से स्वर्ग छीन लिया, देवताओं को अपमानित किया और स्वयं सूर्य, चंद्र, कुबेर, यम और वरुण के अधिकारों का उपभोग करने लगे।
त्रिलोक में पुनः अराजकता फैल गई।

तिरस्कृत देवताओं ने हिमालय में जाकर अपराजिता देवी का स्मरण किया। उसी समय पार्वती देवी के शरीर कोश से अम्बिका / कौशिकी का प्रादुर्भाव हुआ।
पार्वती का वर्ण श्याम हो गया और वे कालिका कहलाईं, जबकि उनसे प्रकट हुई तेजोमयी शक्ति कौशिकी के नाम से विख्यात हुईं।

🌸 कौशिकी और शुम्भ का अहंकार

कौशिकी देवी के अद्भुत सौंदर्य और तेज से मोहित होकर शुम्भ ने दूत भेजा और देवी को अपनी या निशुम्भ की सेवा में प्रस्तुत होने का आदेश दिया।
देवी का उत्तर अत्यंत गर्भित था —

“जो मुझे युद्ध में जीतकर मेरे अभिमान को चूर्ण करेगा, वही मेरा स्वामी होगा।”

यही वाक्य अधर्म के विनाश की घोषणा बन गया।

🔥 धूम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड और काली का प्राकट्य

शुम्भ ने पहले धूम्रलोचन को भेजा, जिसे देवी ने केवल “हुँ” शब्द से भस्म कर दिया।
इसके बाद चण्ड और मुण्ड आए। उनके प्रति अम्बिका के क्रोध से उनके ललाट से महाकाली प्रकट हुईं।

काली का स्वरूप केवल भय का नहीं, बल्कि काल पर विजय का प्रतीक है।
उन्होंने चण्ड और मुण्ड का वध किया और तभी देवी को “चामुण्डा” नाम प्राप्त हुआ।

🌺 नव मातृशक्तियों का अवतरण

जब शुम्भ-निशुम्भ ने विशाल सेना भेजी, तब देवताओं की शक्तियाँ स्वयं देवी से प्रकट हुईं—
• ब्राह्मणी – सृष्टि की शक्ति
• माहेश्वरी – संहार और वैराग्य
• कौमारी – तेज, ब्रह्मचर्य और साहस
• वैष्णवी – धर्म और मर्यादा
• वाराही – यज्ञ और पृथ्वी तत्व
• नरसिंहि – अन्याय पर उग्र न्याय
• ऐंद्रि – नेतृत्व और वज्र शक्ति

यह दर्शाता है कि समस्त देवत्व वास्तव में एक ही महाशक्ति का विस्तार है।

🩸 रक्तबीज : अहंकार की सबसे भयावह छाया

रक्तबीज वह अहंकार है, जो हर वार के बाद और बढ़ जाता है।
देवी चण्डिका और चामुण्डा ने मिलकर उसका रक्त स्वयं पी लिया —
यह संकेत है कि अहंकार का नाश बाहरी नहीं, भीतरी नियंत्रण से होता है।

⚔️ शुम्भ-निशुम्भ वध : अद्वैत का उद्घोष

अंततः देवी ने अपनी सभी शक्तियों को अपने भीतर समाहित कर लिया और कहा —

“मैं एक ही हूँ, दूसरा कोई नहीं।”

यही देवी महात्म्य का सर्वोच्च दर्शन है —
शक्ति विभाजित नहीं, एक है।

देवी के त्रिशूल से शुम्भ का वध हुआ और पृथ्वी पुनः धर्ममय हो गई।

🌼 आध्यात्मिक संदेश
• काली = भय का नहीं, अज्ञान का नाश
• रक्तबीज = बढ़ता हुआ अहंकार
• मातृशक्तियाँ = मानव के भीतर की सकारात्मक शक्तियाँ
• शुम्भ-निशुम्भ = सत्ता और अहं का दंभ

जब मनुष्य अपने भीतर की देवी शक्तियों को जाग्रत करता है, तब कोई भी असुर टिक नहीं सकता।



🌺 उपसंहार

देवी केवल मंदिरों में नहीं,
वह साहस में, संयम में, करुणा में और धर्म में निवास करती हैं।

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः।

🔱 हर हर महादेव
🌸 जय माँ चण्डिका 🌸
#maa #ram #hanuman #shiv🙏🚩🔱

1 week ago | [YT] | 4

अन्नकंण आनंदछंण

राम राम 🙏🔱 तेल से अभिषिक्त महावीर: हनुमान जी और शनि मुक्ति की दिव्य कथा 🔱

यह कथा उस काल की है जब त्रैलोक्य में शनि देव का भय व्याप्त था। राजा हों या रंक, देवता हों या दैत्य—शनि की वक्र दृष्टि से कोई भी अछूता नहीं था। जहाँ शनि की छाया पड़ती, वहाँ वैभव राख हो जाता, और जहाँ उनका प्रकोप होता, वहाँ वर्षों का पुरुषार्थ क्षणों में नष्ट हो जाता।

🔥 रावण का अहंकार और शनि का बंदीगृह

लंका का अधिपति रावण केवल बल और अस्त्रों से ही नहीं, बल्कि तंत्र, अभिचार और ग्रह शक्तियों पर भी अधिकार चाहता था। उसने नवग्रहों को बंदी बना लिया था, ताकि उसकी कुंडली में कोई दोष न रहे।

शनि देव को उसने सबसे कठोर बंधन में रखा—
एक अंधे कारागार में, जहाँ न प्रकाश था, न पूजा, न स्वतंत्रता।

शनि देव का तेज क्षीण हो चला था, पर उनका धर्म अडिग था।

🌊 हनुमान जी का लंका आगमन

उधर माता सीता की खोज में महावीर हनुमान लंका पहुँचे। जब उन्होंने लंका के कारागारों का निरीक्षण किया, तो एक कोठरी से उन्हें करुण पुकार सुनाई दी।

वहाँ उन्होंने शनि देव को जंजीरों में जकड़ा पाया।

शनि देव बोले—

“वीर वानर! यदि तुम सचमुच रामदूत हो, तो मुझे इस अधर्म से मुक्त करो। रावण ने मुझे केवल इसलिए कैद किया है क्योंकि मैं उसके अहंकार को सहन नहीं कर सका।”

हनुमान जी ने बिना विलंब शनि के बंधन तोड़ दिए।

🔥 लंका दहन और तेल का रहस्य

जब रावण ने हनुमान जी की पूँछ में तेल लगवाकर आग लगवाई, तब उसने सोचा कि यह वानर जलकर भस्म हो जाएगा।

परंतु वही तेल—
• हनुमान जी की तप-ऊर्जा से अभिषेक बन गया
• अग्नि उनकी शक्ति का वाहन बन गई

हनुमान जी ने उसी जलती पूँछ से पूरी लंका जला दी।


🪐 शनि देव का वरदान

लंका दहन के बाद शनि देव हनुमान जी के चरणों में गिर पड़े।

उन्होंने कहा—

“हे महाबली! आज तुमने न केवल मुझे मुक्त किया, बल्कि मेरे अहंकार को भी जला दिया। मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ।”

हनुमान जी ने कहा—

“यदि वर देना ही है, तो यह वर दो कि जो भक्त मुझे तेल और सिंदूर से स्मरण करे, उस पर तुम्हारी पीड़ा कम हो जाए।”

शनि देव ने प्रसन्न होकर वचन दिया—

“जो हनुमान की शरण में जाएगा, उसकी साढ़ेसाती, ढैय्या और वक्र दृष्टि शांत हो जाएगी।”

🛕 तभी से चली तेल चढ़ाने की परंपरा

तभी से भक्त—
• हनुमान जी को सरसों का तेल चढ़ाते हैं
• सिंदूर और तेल से उनका लेप करते हैं
• उन्हें संकटमोचक मानते हैं

तेल केवल द्रव्य नहीं—
यह भक्त की कठोर पीड़ा, जमी हुई बाधा और जले हुए दुःख का प्रतीक है।

🌺 कथा का आध्यात्मिक रहस्य

हनुमान जी तेल से अभिषिक्त क्यों होते हैं?

क्योंकि—
• वे उग्र ऊर्जा के देवता हैं
• तेल उनकी उष्णता को संयम देता है
• और भक्त की पीड़ा को शांत करता है

तेल चढ़ाना वास्तव में यह प्रार्थना है—

“हे महावीर! मेरे जीवन की रगड़, संघर्ष और तप—सब तुम्हें समर्पित है।”

🔱 निष्कर्ष

जहाँ शनि का भय समाप्त होता है,
वहाँ हनुमान जी का तेलाभिषेक प्रारंभ होता है।

और इसलिए कहा गया—

“तेल से नहीं, विश्वास से प्रसन्न होते हैं बजरंगबली 🚩

🚩 जय संकटमोचन हनुमान! 🚩
#ram #hanuman #shiv #rudra #sanatan

1 week ago | [YT] | 5

अन्नकंण आनंदछंण

राम राम 🙏 पूरी जिंदगी हम इसी बात में गुजार देते हैं कि "चार लोग क्या कहेंगे" और अंत में चार लोग बस यही कहते हैं कि "राम नाम सत्य है"

✅मस्तक को थोड़ा झुकाओ अभिमान मर जाएगा,
✅आँखें को थोड़ा भीगाओ पत्थर दिल पिघल जाएगा,
✅दांतों को आराम दो स्वास्थ्य सुधर जाएगा,
✅जिव्हा पर विराम लगा कर देखिए क्लेश का कारवाँ गुज़र जाएगा,
✅इच्छाओं को थोड़ा घटाकर देखिए खुशियों का संसार नज़र आएगा🎯

जय श्री राम 🚩जय श्री हनुमान 🔱 जय जय जय श्री आदिशक्ति पराभक्ति जगतजननी माँ श्री दुर्गा भवानी की 🚩🔱🙏
#Ram #hanuman #HARI #krishna #sant #shiv #bhakt #maa

1 month ago | [YT] | 9

अन्नकंण आनंदछंण

राम राम 🙏 सुकून बरबाद होने की दो ही वजह है संसार में....संसारी से मोहब्बत बेपनाह और हकीकत में मेहबूब बेपरवाह 🚩🔱

कर्म बिगड़ने की वजह है दिल का संसार में लगना और धर्म बिगड़ने की वजह है संसार में भगवत् भाव न रह जाना🙏

सुकून मिलता है दिल भगवान में लग जाने से और परम आनन्द मिलता है सर्वत्र भगवान को देखने से 🙏

सुकून और परम आनन्द का क्या मार्ग है? क्या अभी भी ये सवाल है या जवाब मिल गया ?????
#Ram #hanuman #sant #krishna #HARI #bhakt #maa #shiv 🚩🔱🙏🕉🇮🇳

1 month ago (edited) | [YT] | 1

अन्नकंण आनंदछंण

राम राम🚩युगों का वचन: जब हनुमान जी ने उठाया था गोवर्धन🙏🏻

त्रेता का अधूरा वचन, द्वापर में हुआ पूरा
हम सभी जानते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा (छोटी) उंगली पर गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। किन्तु, बहुत कम लोग जानते हैं कि श्रीकृष्ण से पहले, त्रेतायुग में पवनपुत्र हनुमान जी ने भी गोवर्धन पर्वत को उठाया था। यह कथा उस 'वचन' की है, जिसने भगवान को एक युग बाद वापस आने पर विवश कर दिया।
1. रामसेतु निर्माण की चुनौती
त्रेतायुग का समय था। प्रभु श्रीराम की वानर सेना रामेश्वरम के तट पर खड़ी थी। समुद्र पर सेतु (पुल) बनाने का कार्य जोरों पर था। नल और नील के नेतृत्व में वानर और भालू छोटे-बड़े पत्थर ला रहे थे।
तभी वानर सेना में एक चर्चा छिड़ी—"यह महासागर इतना विशाल और गहरा है। छोटे-छोटे पत्थरों से इसे पाटने में तो वर्षों लग जाएंगे। यदि हमें लंका शीघ्र पहुँचना है, तो हमें विशालकाय पर्वतों की आवश्यकता है।"
यह सुनते ही संकटमोचन हनुमान जी ने विचार किया, "प्रभु का कार्य रुकना नहीं चाहिए।" उन्होंने उत्तर दिशा की ओर उड़ान भरी, ज9हाँ विशाल पर्वतों का राजा 'गोवर्धन' स्थित था।
2. हनुमान जी और गोवर्धन का संवाद
हनुमान जी वायु वेग से द्रोणाचल पर्वत की श्रृंखलाओं में पहुंचे। वहां उन्होंने परम तेजस्वी और विशाल गोवर्धन पर्वत को देखा। समय कम था, इसलिए हनुमान जी ने तुरंत गोवर्धन को उठाने के लिए जैसे ही स्पर्श किया, एक अद्भुत घटना घटी।
शाप या परीक्षा?
गोवर्धन को छूते ही हनुमान जी का आधा शरीर पाषाण (पत्थर) जैसा कठोर और सुन्न होने लगा। उसी क्षण पर्वतराज गोवर्धन ने गंभीर वाणी में कहा:
"हे वानर! तुम्हारी यह धृष्टता कैसे हुई? मैं कोई साधारण शिला नहीं हूँ। देवगण भी मुझे नमन करते हैं। मुझे बिना अनुमति स्पर्श करने का साहस तुमने कैसे किया?"
हनुमान जी, जो स्वयं रुद्रावतार हैं, मुस्कुराए। उनका शरीर वज्र का था, वे चाहते तो अपनी शक्ति से पर्वत को चकनाचूर कर सकते थे या बलपूर्वक ले जा सकते थे। पर वे रामदूत थे, विनय उनकी शक्ति थी।
हनुमान जी ने हाथ जोड़कर विनम्रता से कहा:
"हे गिरिराज! मैं अपनी शक्ति के प्रदर्शन के लिए नहीं आया हूँ। मैं तो रघुकुल शिरोमणि प्रभु श्रीराम का सेवक हूँ। मैं चाहूँ तो आपको जबरन ले जा सकता हूँ, किन्तु मैं आपसे भिक्षा मांगता हूँ। प्रभु का कार्य रुका हुआ है, कृपया मेरे साथ चलिए और सेतु का हिस्सा बनकर धन्य हो जाइए।"
3. गोवर्धन की शर्त और हनुमान का वचन
'श्रीराम' का नाम सुनते ही गोवर्धन का क्रोध कपूर की तरह उड़ गया। उनका मन द्रवित हो गया। वे बोले:
"हनुमान! यदि कार्य प्रभु श्रीराम का है, तो मैं चलने को तैयार हूँ। मेरा जन्म ही शायद इसीलिए हुआ है। परन्तु, मेरी एक शर्त है।"
हनुमान जी ने पूछा—"क्या शर्त है पर्वतराज?"
गोवर्धन ने कहा—"मैं तुम्हारे साथ तभी चलूंगा जब तुम मुझे वचन दोगे कि स्वयं प्रभु श्रीराम अपने कर-कमलों से मेरा स्पर्श करेंगे। मैं उनके चरणों की धूलि और उनके हाथों का स्पर्श पाना चाहता हूँ।"
हनुमान जी ने तुरंत वचन दिया—"मैं वचन देता हूँ गिरिराज! प्रभु आपको अवश्य स्पर्श करेंगे।" और फिर हनुमान जी ने उस विशाल पर्वत को अपनी हथेली पर उठा लिया और आकाश मार्ग से दक्षिण की ओर उड़ चले।
4. विधि का विधान और अधूरा सफर
हनुमान जी गोवर्धन को लेकर उड़ ही रहे थे कि रास्ते में (ब्रज मंडल के ऊपर) उन्हें एक आकाशवाणी सुनाई दी या विभीषण जी का संदेश मिला:
"सेतु बंध गया है! अब और पर्वतों की आवश्यकता नहीं है।"
हनुमान जी धर्मसंकट में पड़ गए। यदि वे पर्वत को रामेश्वरम ले जाते हैं, तो उसका उपयोग नहीं होगा। और यदि यहीं छोड़ते हैं, तो वचन का क्या होगा?
विवश होकर हनुमान जी ने गोवर्धन पर्वत को वहीं ब्रज भूमि पर धीरे से रख दिया।
गोवर्धन पर्वत फूट-फूट कर रोने लगे। उन्होंने कहा—"हनुमान! तुमने तो मुझे धोखा दिया। न मैं अपने घर (उत्तर) का रहा, न प्रभु के काम (दक्षिण) आ सका। और मेरा वह वचन? क्या मुझे प्रभु का स्पर्श कभी नहीं मिलेगा?"
5. प्रतीक्षा और श्रीकृष्ण अवतार
गोवर्धन की पीड़ा देखकर हनुमान जी का हृदय भर आया। उन्होंने गोवर्धन को ढांढस बंधाते हुए एक भविष्यवाणी की:
"हे गिरिराज! निराश मत होइए। रघुकुल की रीति है—'प्राण जाए पर वचन न जाए'। मेरा वचन खाली नहीं जाएगा। त्रेतायुग में सेतु का काम पूरा हो चुका है, इसलिए प्रभु अभी आपको स्पर्श नहीं कर सकते। लेकिन आप यहीं प्रतीक्षा करें।"
"द्वापर युग में जब प्रभु श्रीराम 'कृष्ण' के रूप में अवतार लेंगे, तब वे केवल आपको स्पर्श ही नहीं करेंगे, बल्कि सात दिनों तक अपनी उंगली पर उठाकर रखेंगे। आपको देवों के राजा इंद्र के प्रकोप से ब्रज की रक्षा करने का गौरव मिलेगा और आप 'गिरिराज महाराज' के नाम से पूजे जाएंगे।"
6. वचन की पूर्ति
युग बीते। द्वापर आया। भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज में लीलाएं रचीं। जब इंद्र ने ब्रज को डुबोने के लिए प्रलयंकारी वर्षा की, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसी गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठा लिया।
हनुमान जी का वह वचन सत्य सिद्ध हुआ। श्रीराम ने केवल एक बार छूने का वचन दिया था, लेकिन श्रीकृष्ण रूप में उन्होंने गोवर्धन को सात दिन और सात रात तक लगातार स्पर्श किए रखा। त्रेता का वह अधूरा पत्थर, द्वापर में भगवान का 'छत्र' बन गया।
सार:
यह कथा सिखाती है कि ईश्वर के कार्य में की गई प्रतीक्षा कभी व्यर्थ नहीं जाती। गोवर्धन पर्वत को युगों तक धूप और बारिश सहनी पड़ी, लेकिन अंत में उन्हें वह स्थान मिला जो देवताओं को भी दुर्लभ है—साक्षात भगवान के हाथों का स्पर्श।
।। जय श्री राम ।। ।। जय श्री कृष्ण ।।
#ram #krishna #hari #shiv🔱🚩🙏🕉🏹🇮🇳

1 month ago | [YT] | 2

अन्नकंण आनंदछंण

मेरे सद्गुरु श्रीहनुमान है और उनके सर्वस्व प्रभु श्री सीताराम🔱🚩🙏
हनुमान का मतलब है "बिना अहंकार वाला" व्यक्ति।
किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी खूबी है कि वह अपना अहंकार छोड़ दे।

अगर हम श्री हनुमान जी के जीवन और शिक्षाओं पर नज़र डालें, तो हम उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देख सकते हैं जिनके पास था......

सबसे ज़्यादा ज्ञान, धैर्य, बुद्धि, वीरता, दृढ़ संकल्प, जोश, ताकत और अकल्पनीय कल्पनाएँ...उन्हें छठी इंद्रिय यानी कॉमन सेंस का आशीर्वाद मिला था।

जो श्री राम को अपना सर्वस्व बना ले तो, वो ही हनुमान सदा के लिए उसे अपना बना लेते है, उसे सिद्ध बना देते है 🙏🚩🔱राम राम 🔱🚩🙏

#ram #hanuman #sadguru #shiv 🙏🚩🔱🕉🏹🇮🇳

1 month ago | [YT] | 8

अन्नकंण आनंदछंण

🚩राम राम 🚩🙏
अहम् की अकड ज्यादा चल नहीं सकती ....
मौत की घडी कभी टल नहीं सकती ....
लूटकर दौलत भले ही जमा कर दो ....
पाप की कमाई कभी फल नहीं सकती ll

किस्मत पर नाज़ है तो वजह राम हैं...
खुशियां जो पास है तो वजह राम हैं...
मेरे अपने मेरे साथ है तो वजह राम हैं...
मैं तुझसे अपनी चाहत की तलब कैसे न करूँ....
चलती जो ये सांस है तो वजह राम हैं ll

🚩जय श्री राम 🚩🙏
🔱शुभं भवतु🙏🔱
#Ram #krishna #HARI #shiv #hanuman #sant #bhakt

1 month ago | [YT] | 5