अन्नकंण आनंदछंण

Annkan Anandchhan - जीवन में 2 चीजें कभी व्यर्थ ना जाने दें .. अन्नकंण और आनंदछंण 🙏🔱🚩

शरीर कर्म का कार्य है और कर्म शरीर का कारण है, देह और कर्म का बीज (अन्नकंण)..नवीन उत्पत्ति..प्रवाह - सन्तानरूप ..नादि संबंध है।

आनंद के स्रोत को पहचानना ही अध्यात्म का चरम है, यह आपके हमारे अंदर ही है। कोई भी व्यक्ति जिस दिन आनंदित रहने के स्रोत को ढूंढ़ लेगा, उसी दिन उसे सच्ची आध्यात्मिकता प्राप्त हो जाएगी। जीवन परमानंद का अंश है, मानव अंश है परमपिता अंशी हुआ। इस आनंद की प्राप्ति के लिए परमपिता ने वैविध्यपूर्ण संरचना की है। हमारी ज्ञानेंद्रियों से मन-मस्तिष्क प्रभावित होता है। इसका आशय हुआ कि ज्ञानेंद्रियां यदि आनंद संग्रहित कर रही हैं तो जीवन में आनंद और यदि दुख संग्रहित कर रही हैं तो जीवन कष्टदायी नर्क जैसा हो जाता है। ज्ञानेंद्रियों में आंख, कान, नाक, जीभ, और त्वचा को शामिल किया जाता है। मनुष्य को चाहिए कि वह आनंद के लिए इन सारी ज्ञानेंद्रियों से संतुलन, समन्वय और सामंजस्य स्थापित करके चले 🙏🚩

राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे 🚩
सहस्रनाम तत्तुल्यं, राम नाम वरानने 🚩
🔱राम राम राम राम राम🔱